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सत्ता-केंद्रित राजनीति त्याग, वैचारिक क्रांति की ओर लौटे कांग्रेस - डॉ. विवेकानंद मिश्र

सत्ता-केंद्रित राजनीति त्याग, वैचारिक क्रांति की ओर लौटे कांग्रेस - डॉ. विवेकानंद मिश्र

देश की राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों और हालिया चुनाव परिणामों ने कांग्रेस पार्टी के सामने अस्तित्व और दिशा दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. विवेकानंद मिश्र ने एक विस्तृत बातचीत में पार्टी की वर्तमान स्थिति, उसके पतन के कारणों और भविष्य की दिशा पर बेबाक और मर्मभेदी विचार व्यक्त किए। उनका वक्तव्य न केवल संगठन के लिए चेतावनी है, बल्कि एक वैचारिक पुनर्जागरण का आह्वान भी है।

डॉ. मिश्र ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “सत्ता-केंद्रित राजनीति की मृगतृष्णा ने कांग्रेस को उसके मूल उद्देश्य से भटका दिया है।” उन्होंने कहा कि कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक समय में देश की आत्मा और जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था रही है। किंतु आज स्थिति यह है कि पार्टी अपने ही मूल सिद्धांतों और वैचारिक अधिष्ठान से विमुख होती जा रही है।

उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान नेतृत्व संरचना में ऐसे अवसरवादी और स्वार्थपरक तत्व हावी हो गए हैं, जिनका न तो कोई जनाधार है और न ही संगठन के प्रति कोई वास्तविक प्रतिबद्धता। “जो लोग संकटकाल में संगठन के साथ खड़े नहीं हुए, वही आज उसके संचालन में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं,” उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा।

डॉ. मिश्र के अनुसार, यह विडंबना ही है कि जमीनी स्तर पर वर्षों से संघर्ष कर रहे निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया गया है, जबकि सत्ता के गलियारों में सक्रिय रहने वाले और चाटुकारिता में लिप्त लोग निर्णय लेने की स्थिति में हैं। उन्होंने इसे संगठन के लिए “आत्मघाती प्रवृत्ति” बताया।

उन्होंने कहा कि आज पार्टी के भीतर एक ऐसा वातावरण बन गया है, जहां सच्चे और समर्पित कार्यकर्ताओं को न केवल उपेक्षित किया जा रहा है, बल्कि कई बार उन्हें अपमान और प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ रहा है। “जो कार्यकर्ता कठिन परिस्थितियों में भी पार्टी का ध्वज थामे हुए हैं, उनकी अनदेखी संगठन की जड़ों को कमजोर कर रही है,” उन्होंने कहा।

डॉ. मिश्र ने वर्तमान राजनीतिक संस्कृति पर भी तीखा प्रहार करते हुए कहा कि आज कुछ नेता केवल औपचारिकताओं तक सीमित हो गए हैं। वे बड़े होटलों, स्वागत-सत्कार और दिखावटी कार्यक्रमों में व्यस्त रहते हैं, जबकि वास्तविक कार्यकर्ताओं और जनता की समस्याओं से उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है।

उन्होंने प्रकृति के शाश्वत नियमों का उदाहरण देते हुए कहा, “सिंह को घास, बकरी को मांस और सर्प को दूध पिलाकर कोई व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल सकती।” इस रूपक के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि संगठन की संरचना और नेतृत्व प्रकृति और सिद्धांतों के विपरीत होगा, तो उसका पतन निश्चित है।

इस अवसर पर प्रख्यात विचारक आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने भी डॉ. मिश्र के विचारों का समर्थन करते हुए संगठन के वैचारिक और आत्मिक पुनर्निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि “वातानुकूलित कक्षों में बैठकर राजनीति करने और धरातल पर संघर्ष करने में आकाश-पाताल का अंतर होता है।”

आचार्य मिश्र ने कहा कि किसी भी संगठन की असली ताकत उसके तपस्वी और समर्पित कार्यकर्ता होते हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होते। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि जब कोई संगठन अपने मूल सिद्धांतों और कर्मयोगियों को भूलकर केवल सत्ता और अवसरवाद के जाल में फंस जाता है, तो उसका पतन अवश्यंभावी हो जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस को अब बाहरी दिखावे और राजनीतिक आडंबर से बाहर निकलकर आत्ममंथन करना होगा। “चाटुकारिता और स्वार्थपरता संगठन को भीतर से खोखला कर रही है। इससे मुक्त हुए बिना पुनरुत्थान संभव नहीं है,” उन्होंने स्पष्ट किया।

इस पूरे विमर्श का निष्कर्ष एक कठोर लेकिन आवश्यक सत्य के रूप में सामने आया कि यदि कांग्रेस को अपने अस्तित्व को बचाना है, तो उसे वास्तविकता को स्वीकार करना ही होगा। संगठन को भ्रम, मोह और दिखावे की राजनीति से ऊपर उठकर अपने मूल सिद्धांतों की ओर लौटना होगा।

डॉ. विवेकानंद मिश्र ने अंत में कहा कि कांग्रेस के पास आज भी एक मजबूत आधार है—गांव से लेकर केंद्र तक उसका सीधा संपर्क। लेकिन यदि इस आधार को सही दिशा और नेतृत्व नहीं मिला, तो यह भी धीरे-धीरे समाप्त हो सकता है।

उन्होंने स्पष्ट आह्वान किया कि पार्टी को चाहिए कि वह:-

  • चाटुकार और अवसरवादी नेताओं से दूरी बनाए
  • जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मान और जिम्मेदारी दे
  • वैचारिक स्पष्टता और सिद्धांतों को प्राथमिकता दे
  • और सत्ता की लालसा से ऊपर उठकर जनसेवा को अपना मूल उद्देश्य बनाए


अंततः यह कहा जा सकता है कि डॉ. मिश्र और आचार्य मिश्र के विचार कांग्रेस के लिए एक “चेतावनी और अवसर” दोनों हैं। यह चेतावनी है कि यदि अब भी सुधार नहीं किया गया, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है; और यह अवसर है कि पार्टी अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर एक नई वैचारिक दिशा में आगे बढ़े।

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