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भूदान से ग्रामदान तक: बिहार में आचार्य विनोबा भावे की मौन क्रांति और आचार्यकुल

भूदान से ग्रामदान तक: बिहार में आचार्य विनोबा भावे की मौन क्रांति और आचार्यकुल

सत्येंद्र कुमार पाठक , राष्ट्रीय प्रवक्ता , आचार्य कुल
आध्यात्मिक महायज्ञ का उदय 18 अप्रैल 1951 को तेलंगाना के पोचमपल्ली गाँव से शुरू हुआ भूदान आंदोलन केवल एक भूमि सुधार कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह आधुनिक भारत का सबसे बड़ा अहिंसक सामाजिक प्रयोग था। जब आचार्य विनोबा भावे ने पदयात्रा करते हुए बिहार की धरती पर कदम रखा, तो यहाँ के सामंती ढांचे में करुणा की एक नई धारा प्रवाहित हुई। बिहार, जो अपनी उर्वरता और ऐतिहासिक गौरव के लिए जाना जाता था, विनोबा जी के लिए 'हृदय परिवर्तन' की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बना। इस महायज्ञ में जहाँ एक ओर निर्मला देशपांडे जैसी शिष्याओं ने पदयात्रा की मशाल थामी, वहीं दूसरी ओर 'आचार्यकुल' जैसी संस्था ने समाज के बौद्धिक वर्ग—शिक्षकों और विचारकों—को इस क्रांति का सारथी बनाया। विनोबा भावे का दर्शन सरल था: "जैसे हवा और पानी ईश्वर की देन हैं, वैसे ही भूमि भी सबकी है।" उन्होंने गांधीजी के 'ट्रस्टीशिप' (न्यास) के सिद्धांत को धरातल पर उतारा। बिहार में इस आंदोलन को कानूनी शक्ति प्रदान करने के लिए 'बिहार भूदान यज्ञ अधिनियम, 1954' पारित किया गया। भूमिहीनों को गरिमापूर्ण जीवन देना और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में न्याय सुनिश्चित करना।: दानदाताओं से स्वेच्छा से जमीन लेकर उसे 'भूदान यज्ञ समिति' के माध्यम से वितरित करना।
. मगध और पटना प्रमंडल: दान की पराकाष्ठा बिहार का मध्य और दक्षिण हिस्सा आंदोलन का केंद्र बना। मगध की मिट्टी ने विनोबा के आह्वान को एक धर्म-कर्तव्य की तरह स्वीकार कराना था। गया जिला भूदान के मामले में अग्रणी रहा। यहाँ के टिकारी राज और स्थानीय मध्यम वर्गीय जमींदारों ने हज़ारों एकड़ भूमि समर्पित की। नवादा के कौआकोल में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के प्रभाव से सर्वोदय आश्रम की स्थापना हुई, जिसने भूदान को 'ग्रामदान' (सामूहिक स्वामित्व) में बदलने का काम किया। पटना और शाहाबाद (भोजपुर, रोहतास, बक्सर, कैमूर) शाहाबाद के राजपूत और ब्राह्मण जमींदारों ने अपनी उपजाऊ भूमि का छठा हिस्सा दान किया। पटना और नालंदा में जहाँ आज शहरीकरण का दबाव है, वहां उस समय धार्मिक मठों और रईस परिवारों ने भूमिहीनों के पुनर्वास के लिए सैकड़ों एकड़ जमीन छोड़ी। : रामगढ़ राज का दान रामगढ़ शाही परिवार (राजा कामाख्या नारायण सिंह) ने बिहार में लगभग 2 लाख एकड़ से अधिक भूमि दान करने की घोषणा की थी, जो किसी एक परिवार द्वारा किया गया विश्व का सबसे बड़ा दान माना जाता है।
बिहार के अन्य प्रमंडलों में भी भूदान की लहर उतनी ही तीव्र थी: पूर्णिया प्रमंडल: यहाँ जोत का आकार बड़ा होने के कारण दान भी बड़े 'पैच' में मिला। पूर्णिया राज और स्थानीय चौधरिओं ने हज़ारों एकड़ जमीन दी। तिरहुत प्रमंडल: मुजफ्फरपुर और वैशाली में मध्यम किसानों की भागीदारी अधिक रही। यहाँ 'लोकतंत्र की जननी' ने आर्थिक लोकतंत्र का पाठ पढ़ा। कोसी प्रमंडल: सहरसा और मधेपुरा में 'शिकस्त' (नदी की धारा बदलने वाली) और 'पयवस्त' जमीनों का दान मिला। यहाँ भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद आंदोलन सक्रिय रहा। मुंगेर और भागलपुर: बेगूसराय के समाजवादी गढ़ और जमुई के पहाड़ी इलाकों में आदिवासियों के लिए बड़े पैमाने पर भूमि सुरक्षित की गई।
आचार्यकुल: बौद्धिक क्रांति का संवाहक विनोबा भावे ने अनुभव किया कि केवल जमीन बांटने से समाज नहीं बदलेगा; इसके लिए 'लोक-शिक्षण' आवश्यक है। इसी उद्देश्य से 'आचार्यकुल' की स्थापना की गई। : आचार्यकुल का लक्ष्य समाज के शिक्षकों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्ष मार्गदर्शन देने के लिए तैयार करना था। : शिक्षा को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना और गाँव-गाँव में नैतिक मूल्यों की स्थापना करना।
बिहार के हज़ारों शिक्षकों ने आचार्यकुल के माध्यम से भूदान की जमीन के सही वितरण और गाँव के झगड़ों को 'शांति सेना' के माध्यम से सुलझाने का जिम्मा लिया।
. निर्मला देशपांडे: पदयात्रा की शक्ति आचार्य विनोबा की 'मानस पुत्री' निर्मला देशपांडे ने बिहार के गाँवों में भूदान का अलख जगाया। उन्होंने जमींदारों के अहंकार को अपनी सौम्य वाणी से पिघलाया। चंबल के बागियों के हृदय परिवर्तन से लेकर बिहार के सुदूर गाँवों में महिलाओं को जोड़ने तक, निर्मला जी ने साबित किया कि भूदान केवल एक सरकारी रिकॉर्ड नहीं, बल्कि एक मानवीय जुड़ाव है।
. वर्तमान चुनौतियां: 6.48 लाख एकड़ का सच आंकड़ों के अनुसार, बिहार को कुल 6,48,474 एकड़ भूमि दान में मिली। लेकिन आज 70 साल बाद स्थिति जटिल है: श्रेणी क्षेत्रफल (लगभग) मुख्य समस्या - वितरित भूमि ~2.50 लाख एकड़ पर्चा मिला पर कब्जा नहीं (दखल-दहानी की कमी) विवादित/अनुपयुक्त ~1.50 लाख एकड़ पहाड़, नदी या सरकारी वन भूमि होना लापता/अस्पष्ट ~3.20 लाख एकड़ खाता-खेसरा और चौहद्दी का रिकॉर्ड न होना
संकट के प्रमुख कारण:।रिकॉर्ड की कमी: दान के समय केवल 'रकबा' लिखा गया, जिससे आज जमीन की पहचान कठिन है। अवैध कब्जा: पुरानी पीढ़ी के दान के बाद अगली पीढ़ी ने या स्थानीय भू-माफियाओं ने उन जमीनों को फिर से हड़प लिया है। शहरीकरण: पटना और गया जैसे जिलों में भूदान की कीमती जमीनों पर अवैध कॉलोनियां कट गई है । बिहार सरकार वर्तमान में 'डिजिटल सर्वेक्षण' और 'विशेष राजस्व शिविरों' के माध्यम से भूदान की जमीनों को चिन्हित कर रही है। 'राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग' अब पुराने दानपत्रों का मिलान वर्तमान खतियान से कर रहा है ताकि भूमिहीनों को उनका वास्तविक मालिकाना हक मिल सके। फास्ट ट्रैक कोर्ट: भूदान से जुड़े मुकदमों के लिए विशेष अदालतों का गठन। आचार्यकुल का पुनरुद्धार: वर्तमान बुद्धिजीवी वर्ग को पुनः गाँवों से जोड़ना ताकि वे 'मध्यस्थ' की भूमिका निभा सकें। ग्राम सभा की शक्ति: गाँव के बुजुर्गों की मदद से 'लापता' जमीनों की चौहद्दी तय करना है। आचार्यकुल के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य डॉ धर्मेंद्र ने आचार्यकुल के उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए कार्य रूप दिया जा रहा है । कला संस्कृति प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय प्रभारी डॉ ऊषा श्रीवास्तव द्वारा आचार्यकुल और भूदान यज्ञ का समन्वय कार्य में सक्रियता की जा रही है ।
गया से लेकर पूर्णिया तक और चंपारण से लेकर मुंगेर तक फैली भूदान की यह जमीन आज भी सामाजिक न्याय की बाट जोह रही है। आचार्य विनोबा भावे और निर्मला देशपांडे ने हमें एक ऐसा रास्ता दिखाया था जहाँ 'संगच्छध्वं संवदध्वं' (साथ चलें, साथ बोलें) का भाव था। यदि हम 3.2 लाख एकड़ 'अस्पष्ट' जमीन को पारदर्शी तरीके से चिन्हित कर लें, तो बिहार में एक भी व्यक्ति भूमिहीन नहीं रहेगा। यह न केवल आर्थिक सुधार होगा, बल्कि उन उदारवादी पूर्वजों के प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी जिन्होंने अपनी धरती का मोह त्याग कर मानवता को चुना था।
संदर्भ सूत्र: - बिहार भूदान यज्ञ अधिनियम, 1954 (संशोधित) , 'भूदान गंगा' - आचार्य विनोबा भावे ,'पदयात्रा संस्मरण' - निर्मला देशपांडे , बिहार राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 ,आचार्यकुल (वर्धा) के ऐतिहासिक अभिलेख ।


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