मधुशाला का राज
संजय जैनआज मधुशाला में मेरा
पहला पहला दिन था।
पीकर मस्त हुआ था ही
की मेरा बुलावा आ गया।
जितनी मैंने पी रख थी
सब मेरी फिर उतर गई।
हालत मेरी ऐसी हो गई
कैसे बताऊँ तुमको अब।।
अपनी आप बीती को
किस तरह से सुनाऊँ मैं।
जिंदगी की हकीकत से
किस तरह मुँह छुपाऊँ मैं।
आज परेशान हूँ बहुत तो
क्यों इससे डर जाऊँ मैं ।
हिम्मत जुटाने के लिए
क्यों मधुशाला जाऊँ मैं।।
दर-दर की ठोकर खा कर
जिंदगी का सबक सीख लिया।
अपनी गलतियों का इजहार
करने का साहस जुटा लिया।
या अपने अभिमान के कारण
खुद को उसमें समा लिया।
अपनी जिंदगी का ये राज
किस कारण से छुपा लिया।।
सीखो और सिखा दो तुम
दुनिया वालों को सबक।
राज का पर्दा उठा दो
दुनिया का सच बता दो।
जिंदगी जीने का तरीका
अब तो तुम समझा दो।
और अपने अनुभवों से
घर परिवार को महका दो।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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