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ज्येष्ठ मास महात्मय {पंचम अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {पंचम अध्याय}

ऋषि लोग स्कन्दजी से बोले कि हे अगस्त्य जी ! ज्येष्ठ मास मे खियों सौभाग्य के लिये विशेष रूप से कौन सा व्रत और दान करें ? सो आप कृपा कर कहिये ॥ १ ॥

स्कन्द जी बोले कि किसी समय कैलास पर्वत के शिखर पर भगवान् शङ्कर सुख से बैठे थे, पार्वतीजी ने शिवजी को प्रणाम किया और हाथ जोडकर बोलीं ॥ २ ॥

पार्वतीजी ने कहा कि हे शिव ! हे शम्भो ! हे जगन्नाथ ! हे सर्वज्ञ ! हे सुखदायक ! मेरे समान ऐश्वर्य सुख सौभाग्य किसी का नहीं हैं ॥ ३ ॥

हे शङ्कर ! यह ऐश्वर्य सुख और सौभाग्य जिस उपाय के द्वारा अक्षय (नाश रहित) हो और हे कृपा-निधे ! आपके साथ अजर अमर होकर रहें ॥ ४ ॥

हे प्रभो! जब तप से गर्वित होकर सावित्री ने अपने स्वामी का गृह त्यागा और समस्त लोगों को शाप दे दिया उस समय आपने सावित्री को मना नहीं किया ।॥५॥

और वह ब्रह्मा से बोली कि हे निर्लज्ज ! बकरी के गले में विना दूध के निरर्थक स्तन के समान तू प्राणों का त्याग कर। इस प्रकार सावित्री के वचन को सुनकर कोप से ब्रह्मा लाल हो गये और बोले कि ॥ ६ ॥

अरे मुंढे ! तू पृथिवी पर वृक्ष योनि मे होकर वास कर । जब देवताओं ने प्रार्थना किया तब ब्रह्मा ने उस शाप से उद्धार कर दिया ॥ ७ ॥

इसलिये हे कृपासिन्धो ! यदि मेरे ऊपर आपका अनुग्रह है तो उस उपाय को कहिये। क्योंकि स्वर्ग लोक मे महेन्द्र तथा प्रजा-पति का भी नाश कहा है ॥ ८ ॥


श्री शिवजी बोलें कि हे वरानने ! जितने दृश्यमान पदार्थ हैं उन सभों का नाश निश्चित हैं, फिर भी तुम्हारे भक्ति के वशीभूत होकर मैं उपाय कहूँगा ॥९॥


हे भद्रे ! ज्येष्ठ मास की तृतीया तिथि के
दिन स्नान कर नियम में तत्पर रहकर यत्नपूर्वक श्रेष्ठ रम्भाव्रत को करो ॥ १० ॥


पार्वती बोली कि हे प्रभो ! यह रम्भा कौन है ? और समाहित चित्त होकर रम्भाव्रत कैसे करना चाहिये। शिवजी बोले कि हे वरानने ! जब सावित्री को ब्रह्मा ने शाप दिया तब सावित्री जड़ (वृत्त) रूप हो गई ॥ ११ ॥


और वही यह रम्भा, कदली और कपूर-जननी नाम से प्रसिद्ध हुई । तथा क्रोध से सन्तप्त सावित्री अपने पिता के घर में रहने लगी ॥१२॥


और जब पिता के उपदेश से ज्येष्ठ मास में स्नान पूजन आदि पाँच वर्ष तक किया तब ब्रह्मा प्रसन्न हो गये ॥ १३ ॥


और हे शुभे ! ज्येष्ठ मास की तृतीया के दिन उस सावित्री के सामने प्रकट होकर ब्रह्मा ने पृथिवी के दुर्लभ बहुत से बरदानों को दिया है उनको तुम सुनो ॥ १४ ॥


ब्रह्मा ने सावित्री से कहा कि हे शुभे ! तुम जगत् के कल्याण के लिये अंश से रम्भा (केला) हो जाओ। हे शुचिस्मिते ! जो ज्येष्ठ मास से तुम्हारा श्रेष्ठ पुजन करेंगी ॥ १५ ॥


उनका सौभाग्य सुख सम्पदा अक्षय (नाशरहित) होगा। वाद ब्रह्मा सावित्री के साथ सत्यलोक को चले गये ॥ १६ ॥


हे भद्रे ! यह सावित्री के शाप का कारण तुमसे कहा। अब थोड़े में रम्भा व्रत का विधान कहता हूँ ॥१७॥


हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! ज्येष्ठमास की तृतीया के दिन बगीचा या गृह मे अपनी शक्ति के अनुसार कदलो (केला) का वन लगावे ॥ १८ ॥


पञ्चामृत, विविध गन्ध, पुष्पमाला, कपूर, पवित्र शीतल खश से वासित जल आदि से ॥१९॥


प्रतिदिन आलवाल (वृक्ष के थाला) में सिञ्चन करे। इस तरह सुन्दर वन को बनाकर उसके नाभि (मध्य) में कलश स्थित करे ॥२०॥


और सुवर्ण की बनी उस ब्रह्मा की प्रतिमा को कलश के ऊपर स्थापित कर पोडशोपचार से पूजन करे, विविध प्रकार का नैवेद्य अर्पण करे ॥ २१ ॥


अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन करावे और स्वयं हविष्यान्न भोजन कर गीत, वाद्य, पुराण श्रवण ॥ २२ ।।


कथा श्रवण (माहात्म्य श्रवण), कीर्तन के द्वारा देवता के सामने जागरण करे।
इसी तरह कदलीवन में बैठकर प्रतिदिन पूजन करे ॥ २३ ॥


समस्त कामनाओं की इच्छा करने वाले मनुष्य इस तरह मासव्रत को करें । एक मास पूर्ण होने पर घर वगैरह आचार्य को दे देवे ॥ २४ ॥


और बहुत सा दान देकर दूध देने वाली गौ का दान देवे । यथाशक्ति हवन कर ब्राह्मणों को भूरिदक्षिणा (भूयसी दक्षिणा) देवे ॥ २५॥


और अपनी शक्ति के अनुसार शर्करायुक्त पायस से ब्राह्मणों को भोजन करावे । वाद विसर्जन कर पारण करे और प्राणियों को बहुत सा अन्न दान देवे ॥ २६ ॥


हे भद्रे ! पहिले तुमने मुझको प्रसन्न किया था इसलिये यह सब रहस्य तुमसे कहा। हे भद्रे ! इस व्रत को यत्नपूर्वक करो, तुमको शाश्वत फल मिलेगा ॥ २७ ॥


प्रथम सूर्यपुत्र के निग्रह से इस व्रत को जगदीश्वर ने गुप्त रक्खा था उस पवित्र व्रत को जगत् के गुरु शङ्कर भगवान् ने दीनों पर कृपा कर पार्वती जी से कहा ।। २८ ।।


इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' १० माधवप्रसाद-व्यासेन कृतायां भापाटीकायां पञ्चमोऽध्यायः॥ ५ ॥


क्रमशः...〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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