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ज्येष्ठ मास महात्मय {उनतीसवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {उनतीसवां अध्याय} 

लेखक: आनन्द हठीला
ऋपिलोग बोले कि हे स्कन्द जी ! ज्येष्ठ मास में स्नान दान और माहात्म्य श्रवण तथा पुराण पुरुपपूजन क़ा फल विस्तार से कहिये ॥ १ ॥

स्कन्द जी बोले कि हे ऋपि लोग ! आप सब लोग ज्येष्ठस्नान के फल का श्रवण करें, जिसके फलश्रवण से प्राणी तीनों (मन वचन कर्मकृत) पाप से मुक्त हो जाता है ॥ २ ॥

जो प्राणी वृप के सूर्य होने पर 'मैं प्रातःकाल ज्येष्ठस्नान करूंगा' ऐसा संकल्प कर जल मे प्रवेश करता है उसके तीनों पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ३ ॥

सूर्योदय के पूर्व ज्येष्ठस्नान करना चाहिये, ज्येष्ठमास में सुर्योदय से लेकर आधा प्रहर पर्यन्त जहां कहीं भी जल में ॥ ४ ॥

गङ्गादि सभी तीर्थ वास करते है। इस लिये सूर्योदय से लेकर आधा प्रहर के पूर्व स्नान कर । लेना चाहिये ।। ५ ।।

आधा प्रहर के बाद स्नानहीन दैव से उपहत जनों को वे तीर्थ शाप देते है। इस लिये ज्येष्ठ मास मे श्रेष्ठ जनों को स्नान करना चाहिये ॥ ६ ॥

ईर्पा, धन, लोभ, सेवा, हठ, लोकापवाद, निमित्त, स्वेच्छा, भय, पाखण्ड, सुख लिप्सा, आदि किसी भी उपाय से ज्येष्ठ स्नान करना चाहिये। परन्तु कलि में अधिक पाप होने के कारण ज्येष्ठस्नान अत्यन्त दुर्लभ होगा ॥ ७-८ ॥

श्रेष्ठ स्नान के श्रेष्ठ फल से डरकर यमराज ने इसे गुप्त रखने के निमित्त त्रिविक्रम (विष्णु भगवान्) से प्रार्थना किया और विष्णु की आज्ञा से इसे गुप्त कर रखा है। इस ज्येष्ठमास में स्वन्प कर्म करने वालों को विव्न होते हैं ॥ ९ ॥

ऋषि लोग बोले कि हे स्कन्दजी ! यमराज ने मासमाहात्म्य को गुप्त क्यों किया ? और ज्येष्ठ में पुण्य कर्म करने वालों के कार्य मे विघ्न क्यों करते हैं ॥ १० ॥

हे स्कन्दजी ! यह सब सुनने की बहुत इच्छा है सो आप हम लोगों से कहिये ॥ ११ ॥

सूत जो बोले कि इस विषय मे मैं प्राचीन इतिहास कहूँगा जिसके श्रवण से आप लोगों के हृदय का संदेह दूर हो जायगा ॥ १२ ॥

प्रथम माहिष्मती पुर (नगर) में कनक नाम का ब्राह्मण रहता था वह समस्त विद्या से हीन, मूर्ख और परनिन्दक था ॥ १३ ॥

और कृषिकर्म का करने वाला वह नित्य क्रय विक्रय करता था, ओर भी अनेकों व्यवसाय से कुटुम्न का उदर पूर्ण करता था ॥ १४ ॥

इतने पर भी उस दुरात्मा कुटुम्बी को तृप्ति न हुई और उसने उदरपूत्ति के निमित्त मार्ग मे पथिकों का वध किया। फिर भी जब तृप्ति न हुई तो उस द्विजाधम ने चोरी किया ॥ १५ ॥

इस तरह वह द्विजाधम माहिष्मती नगरी में रहकर प्रतिदिन यह काम करता था। किसी दिन चोरी करते देखे जाने के कारण उसे ग्रामवासियों ने पकड़ा ॥ १६ ॥

और बांधकर अच्छी तरह पीटा तथा अपने नगर से उसे निकाल दिया। वह कुछ दिन ग्राम के समीप वन में जाकर रहा ॥ १७ ॥

और रात्रि मे गृह मे आकर पुनः वन चला जता था, तथा वन में श्वापद (पशुओं) का वध कर वह निघृण (निर्दय) भक्षण करता था ।॥ १८ ॥

इस तरह काम करते उसको बहुत समय बीत गया। हे राजन् ! बहुत समय बीतने के बाद जब ज्येष्ठमास आया ॥ १९ ॥

तब वह कनक ब्राह्मण अर्धरात्रि के समय वन से अपने गृह को आया और वस्त्र अलङ्कार की चोरी कर पुनः वन को गया. ॥ २० ॥

मार्ग मे नदी को देखा और उसे वैरकर पार किया, इस तरह अज्ञान वश ज्येष्ठमास मे उस ब्राह्मण ने स्नान किया ॥२१॥

और प्रतिदिन रात्रि मे वन से आकर चोरी करता था और चोरो का घन लेकर प्रतिदिन उस नदी में स्नान करता हुआ वन को जाता था ।॥ २२ ॥

इस तरह सदा अज्ञानवश स्नान करते उसे एक मास बीत गया । हे द्विजश्रेष्ठ ! ज्येष्ठशुक्ल चतुर्दशी की रात्रि में ॥२३॥

धन वस्त्र की चोरी कर गहर बांधा और नगर के बाहर आया, तबतक प्रभात का समय हो गया था और इधर उधर लोगों को देखकर ॥ २४ ॥

वहां से भागता हुआ नदी के तटपर आया, लोगों ने समीप पहुंचकर उसे पीठ पर काष्ठ (लकड़ी) पापाण (पत्थर) से खूब पीटा ॥ २५ ॥

इतने मे वह' कनक उस भार को शिर पर धरकर अगाध जल में पहुंचा और अधिक शिथिल होने के कारण उस अगाध जल में गिर कर मर गया ॥ २६ ॥

उस कनक के लिये सूर्य के समान तेजयुक्त दिव्य विमान बैकुण्ठ से आया। इधर उस कनक को अगाध जल में डूबते देखकर यह क्या हुआ, यह क्या हुआ कहते हुये सभी लोग विस्मित होगये ॥ २७ ॥

नदीतट के कुछ लोगों ने उस अगाध जल से निकाल कर उसे बाहर किया, उसे देखकर लोगों ने कहा कि यह तो इसी नगर का रहने वाला कनक ब्राह्मण है, हमलोगो ने इसे नगर के बाहर कर दिया था ॥ २८ ॥

उसी क्षण मे वह कनक ब्राह्मण उत्तम रूप को प्राप्त होकर वह दिव्यपुरुष विमान के सहित दूतों को देखकर बोला ॥ २९ ॥

दिव्यपुरुष बोला कि हे दूतलोग ! यह वैकुण्ठ से आया हुआ विमान किस पुण्य से प्राप्त हुआ है ॥ ३० ॥

देवदूत बोले कि हे कनक ब्राह्मण ! अज्ञात ज्येष्ठमास के स्नान से यह दुर्लभ विमान मिला है, यह सुनकर विमान पर सवार होकर वैकुण्ठ लोक को चला गया ॥ ३१ ॥

और वह कनक ब्राह्मण विष्णु भगवान् के समान रूप को प्राप्त हुआ । तथा यमराज इस समाचार को सुनकर परम दुखी हो गये ॥ ३२ ॥

और यमराज ने जगत्पति विष्णु भगवान् से प्रार्थना कर ज्येष्ठमास माहात्म्य को गुप्तकर रखा। हे द्विज लोग ! मैंने आप लोगों से ज्येष्ठमास के स्नान का माहात्म्य फल कहा ॥ ३३ ॥

इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्य-वंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
क्रमशः..
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