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ज्येष्ठ मास महात्मय {अट्ठाईसवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {अट्ठाईसवां अध्याय}

लेखक: आनन्द हठीला
। स्कन्दजी बोले कि हे विप्र ! प्रथम लोकप्रसिद्ध वृन्दारक नाम का ब्राह्मण हुआ, वह वेद शास्त्र का, ज्ञाता, धनी और अनेक बन्धु बान्धव से सम्पन्न था ॥ १ ॥

उस ब्राह्मण की स्त्री रूप गुण से युक्त देवसेना नाम की थी, उस स्त्री के साथ ब्राह्मण ने चिरकाल पर्यन्त सुखभोग किया ॥ २ ॥

किसी समय वृद्धावस्था से युक्त वह ब्राह्मण पुत्रहीन होने के कारण अत्यन्त दुखी हो गया और उसने अनेकों व्रत तथा यथाविधि दोनों को किया ॥ ३ ॥

अब तक उस ब्राह्मण को पितृऋण से मुक्त करने वाली सन्तति न हुई तब वह ब्राह्मण प्राणत्याग करने के निमित्त गहन वन को गया ॥ ४ ॥

वन मे जाकर निद्रा भोजन का त्याग कर स्थित हो गया, चतुर्थ दिन विकलतावश वह ब्राह्मण मूच्छित होकर वन से गिर पड़ा ।। ५ ।।


दयालु भगवान् उसके निश्चय को जानकर ब्राह्मणवेश में होकर उसके पास आये और वचन बोले ॥ ६ ॥


ब्राह्मण ने कहा कि हे ब्राह्मण! तुम कौन हो ? कहाँ से आये हो? और प्राण त्याग क्यों करते हो ? । ब्राह्मण के श्रेष्ठ वचन को सुनकर वृन्दारक विप्र ने अपना सत्र वृत्तान्त कहा ।। ७-।।


समाचार सुनकर द्विजरूपी जनार्दन भगवान् पुनः बोले कि हे सखे ! तुम अपने गृह को जाओ और मुझसे उपदिष्ट व्रत को करो ॥ ८ ॥


ज्येष्ठ मास आने पर जितेन्द्रिय होकर सूर्योदय के समय प्रतिदिन स्नान करो ॥ ९ ॥


एक मास विधि-पूर्वक ब्रह्मचर्य से रहकर हविष्यान्न भोजन करो और त्रिविक्रम भगवान् का पूजन तथा दही भात का नैवेद्य अर्पण करो । और वृच्चों में तथा ब्राह्मणों के गृह में जल दान करो ॥ १० ॥


हे द्विजश्रेष्ठ ! इस उपाय के करने से तुमको पुत्र होगा, यह कहकर अद्भुत वह ब्राह्मण अन्तर्हित हो गया ॥ ११ ॥


वृन्दारक उसे विष्णुरूप मानकर अपने घर को गया और अद्भुत ब्राह्मण के कथनानुसार अपनी स्त्री के साथ व्रत करने को तत्पर हुआ ।॥ १२ ॥


तथा प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करने लगा। किसी समय दैवयोग से शरावती नदी के तटभाग के वृक्षों के झुण्ड में एक व्याघ्र को देखा, वह अत्यन्त भूखा व्याघ्र वृन्दारक के समीप आया ॥ १३-१४ ॥


उस व्याघ्र को समीप आया देखकर वृन्दारक ने जलपात्र को उसपर फेका और जलबिन्दु के स्पर्श से वह व्याघ्र दिव्यदेह हो गया ॥ १५ ॥


तथा वह प्रसन्नात्मा व्याघ्र बोला कि हे ब्रह्मन् ! आपके दर्शन से मैं धन्य हूँ। हे ब्रह्मन् ! प्रथम मैं व्याध (बहेलिया) था और मैंने अनेकों हिंसा किया ॥१६॥


उस दोष से व्याघ्र हो गया था आज उस दोप से युक्त मैं आपके दर्शन से मुक्त हो गया। हे भद्र ! क्या आप पुण्य करते हैं?, हे भद्र ! वह पुण्य कृपाकर सुझको दे दीजिये ॥ १७ ॥


व्याघ्र के ऐसा कहने पर वृन्दारक ब्राह्मण मासकृत पुण्य को उस व्याघ्र के लिये दे दिया और वह व्याघ्र मासकृत पुण्य के प्रभाव से स्वर्गलोक को गया ॥ १८ ॥


मासपुण्य देने के बाद वृन्दारक ब्राह्मण ने पुनः अद्भुत मासव्रत को किया और उस मासव्रत के प्रभाव से महान् ओजस्वी पुत्र पैदा हुआ ॥ १९ ॥


उस पुत्र के होने पर ब्राह्मण ने उस अद्भुत ब्राह्मण के वचन को सत्य माना ॥ २० ॥


स्कन्द जी बोले कि हे द्विजश्रेष्ठ ! मैंने आप लोगों से मासस्नान का माहात्म्य कहा, जिस मासस्नान के जलबिन्दु स्पर्श से वह परम हिंसक व्याध मुक्त हो गया ॥ २१ ॥


और वृन्दारक ब्राह्मण को विष्णु सदृश और विष्णु भगवान् का भक्त वैष्णव पुत्र मिला। हे ब्राह्मण लोग! अब आपको क्या सुनने की इच्छा है सो आप मुझसे कहिये ॥ २२ ॥


इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य विद्यारत्न' १० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां 'भापाटीकायां अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥


क्रमशः...〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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