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अयोग्य और नकारों को सम्मानित करना: सम्मान की गरिमा पर एक गंभीर प्रहार

अयोग्य और नकारों को सम्मानित करना: सम्मान की गरिमा पर एक गंभीर प्रहार

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ सम्मान और प्रतिष्ठा की अवधारणा भी विकसित हुई है। किसी व्यक्ति को सम्मानित करने की परंपरा इसलिए प्रारंभ हुई थी ताकि समाज में उत्कृष्ट कार्य करने वालों, त्याग, तपस्या, ज्ञान, सेवा, वीरता और लोककल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले व्यक्तियों को पहचान मिले तथा आने वाली पीढ़ियां उनसे प्रेरणा प्राप्त कर सकें। सम्मान का मूल उद्देश्य कभी भी किसी व्यक्ति की अहंकार-तुष्टि नहीं था, बल्कि समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करना था।

किन्तु वर्तमान समय में सम्मान की यह पवित्र व्यवस्था अनेक स्थानों पर अपने मूल उद्देश्य से भटकती दिखाई दे रही है। आज ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां योग्यता, कर्म और उपलब्धि की अपेक्षा संबंध, प्रभाव, आर्थिक सामर्थ्य, राजनीतिक निकटता या व्यक्तिगत स्वार्थ के आधार पर सम्मान वितरित किए जाते हैं। परिणामस्वरूप सम्मान का वास्तविक मूल्य कम होता जा रहा है और योग्य व्यक्तियों के मन में निराशा का भाव उत्पन्न हो रहा है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अयोग्य और नकारे लोगों को सम्मानित करना केवल एक व्यक्ति को अनावश्यक प्रतिष्ठा देना नहीं है, बल्कि यह सम्मान की पूरी अवधारणा पर आघात है। जब सम्मान पात्रता के स्थान पर प्रबंधन का विषय बन जाता है, तब समाज की नैतिक संरचना भी कमजोर होने लगती है।

सम्मान का वास्तविक अर्थ


सम्मान शब्द अपने भीतर अत्यंत व्यापक अर्थ समेटे हुए है। सम्मान केवल मंच पर माला पहनाने, शॉल ओढ़ाने या प्रशस्ति पत्र देने का नाम नहीं है। वास्तविक सम्मान वह सामाजिक स्वीकृति है जो किसी व्यक्ति को उसके उत्कृष्ट योगदान के कारण प्राप्त होती है।

प्राचीन भारतीय संस्कृति में सम्मान का आधार सदैव कर्म रहा है। सनातन परंपरा में कहा गया है-

"पूज्यते यद् गुणैरेव न च जन्मेन कर्हिचित्।"

अर्थात व्यक्ति की पूजा या सम्मान उसके गुणों के कारण होता है, जन्म या बाहरी पहचान के कारण नहीं।

भारतीय इतिहास में जिन महापुरुषों को समाज ने सम्मान दिया, उसके पीछे उनके असाधारण कार्य थे। चाहे वे महर्षि वेदव्यास हों, महर्षि वाल्मीकि हों, भगवान बुद्ध हों, आचार्य चाणक्य हों, स्वामी विवेकानंद हों, महात्मा गांधी हों या डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, सभी को सम्मान उनके योगदान के कारण मिला।

सम्मान का उद्देश्य केवल व्यक्ति को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश देना है कि कौन-से गुण अनुकरणीय हैं। यदि सम्मान का आधार ही बदल जाए तो समाज के आदर्श भी बदल जाते हैं।

सम्मान और पुरस्कार में अंतर


अक्सर लोग सम्मान और पुरस्कार को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में अंतर है।

पुरस्कार किसी विशेष उपलब्धि या प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए दिया जाता है, जबकि सम्मान व्यक्ति के समग्र योगदान, चरित्र, सेवा और व्यक्तित्व की स्वीकृति है।

एक खिलाड़ी प्रतियोगिता जीतकर पुरस्कार प्राप्त कर सकता है, लेकिन सम्मान उसे तब मिलता है जब उसका व्यक्तित्व समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।

इसी कारण सम्मान का स्तर पुरस्कार से कहीं अधिक ऊंचा माना गया है। सम्मान समाज की नैतिक स्वीकृति है।
वर्तमान समय में सम्मान की बदलती प्रवृत्ति

आज अनेक स्थानों पर सम्मान एक प्रकार का सामाजिक व्यवसाय बन गया है। कुछ संस्थाएं प्रतिवर्ष सैकड़ों सम्मान वितरित करती हैं। कई बार सम्मान प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के कार्यों की कोई जांच-पड़ताल तक नहीं की जाती।

कुछ स्थानों पर तो स्थिति यह है कि जो व्यक्ति कार्यक्रम का खर्च उठाता है या प्रायोजन देता है, उसे सम्मानित कर दिया जाता है। कहीं राजनीतिक लाभ के लिए सम्मान दिए जाते हैं, तो कहीं व्यक्तिगत संबंधों को मजबूत करने के लिए।

सोशल मीडिया के युग में यह प्रवृत्ति और भी बढ़ी है। आज अनेक लोग सम्मान प्राप्त करने की तस्वीरें साझा करके सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करना चाहते हैं, भले ही उनके कार्यों का कोई विशेष महत्व न हो।

दुर्भाग्य यह है कि सम्मान पाने की इच्छा कई बार सेवा से अधिक बड़ी हो गई है।
बिना कार्य किए सम्मान पाने की मानसिकता

आज समाज में एक नई मानसिकता विकसित हो रही है। कुछ लोग यह मानने लगे हैं कि उन्हें सम्मान मिलना ही चाहिए, चाहे उन्होंने कोई उल्लेखनीय कार्य किया हो या नहीं।

ऐसे लोग विभिन्न मंचों, संगठनों और आयोजनों में स्वयं को सम्मानित करवाने के अवसर खोजते रहते हैं। उनका लक्ष्य समाज की सेवा नहीं, बल्कि सम्मान प्राप्त करना होता है।

वे यह भूल जाते हैं कि सम्मान कभी मांगा नहीं जाता। सम्मान तो समाज स्वयं देता है।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि व्यक्ति को अपने कार्य पर ध्यान देना चाहिए, यश और सम्मान अपने आप उसके पीछे आएंगे।

किन्तु आज अनेक लोग कार्य कम और प्रचार अधिक करते हैं। वे चाहते हैं कि उपलब्धि बाद में आए, सम्मान पहले मिल जाए।

यह प्रवृत्ति समाज के लिए अत्यंत घातक है।

अयोग्य व्यक्ति को सम्मान देने के दुष्परिणाम


जब अयोग्य व्यक्ति को सम्मान मिलता है, तब इसके अनेक नकारात्मक परिणाम सामने आते हैं।
1. योग्य व्यक्तियों का मनोबल टूटता है

जो लोग वर्षों तक परिश्रम करते हैं, समाज सेवा करते हैं, संघर्ष करते हैं और उत्कृष्ट कार्य करते हैं, वे तब निराश हो जाते हैं जब देखते हैं कि बिना किसी विशेष योगदान वाले लोगों को भी समान या उससे अधिक सम्मान मिल रहा है।

इससे उनकी प्रेरणा प्रभावित होती है।
2. समाज के आदर्श बदल जाते हैं

सम्मानित व्यक्ति समाज के लिए आदर्श बन जाता है। यदि सम्मान अयोग्य लोगों को मिलेगा तो नई पीढ़ी गलत आदर्शों का अनुसरण करेगी।

युवा यह मानने लगेंगे कि सफलता का मार्ग कर्म नहीं, बल्कि संपर्क और प्रबंधन है।
3. सम्मान का मूल्य घट जाता है

जिस प्रकार नकली मुद्रा के प्रसार से असली मुद्रा का मूल्य प्रभावित होता है, उसी प्रकार अयोग्य लोगों को सम्मान देने से वास्तविक सम्मान का मूल्य कम हो जाता है।

जब हर व्यक्ति सम्मानित होने लगे तो सम्मान की विशिष्टता समाप्त हो जाती है।
4. संस्थाओं की विश्वसनीयता घटती है

जो संस्थाएं बिना पात्रता के सम्मान बांटती हैं, उनकी विश्वसनीयता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

लोग ऐसे सम्मानों को गंभीरता से लेना बंद कर देते हैं।
5. समाज में चाटुकारिता बढ़ती है

जब योग्यता के स्थान पर संबंधों के आधार पर सम्मान मिलने लगे तो लोग कार्य करने की अपेक्षा प्रभावशाली लोगों को खुश करने में लग जाते हैं

  • इससे चाटुकारिता की संस्कृति विकसित होती है।
  • भारतीय परंपरा में पात्रता का महत्व
  • भारतीय संस्कृति सदैव पात्रता आधारित सम्मान की पक्षधर रही है।
  • गुरुकुलों में भी शिष्य का सम्मान उसके ज्ञान, अनुशासन और आचरण के आधार पर होता था।
  • राजाओं के दरबार में विद्वानों को सम्मान मिलता था क्योंकि वे ज्ञान और प्रतिभा के धनी होते थे।
  • महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में भी पात्रता को सर्वोच्च महत्व दिया गया है।
  • भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कर्म की महत्ता को सर्वोपरि बताया है।
  • यदि कर्म नहीं है तो सम्मान का कोई आधार नहीं है।

राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में सम्मान का दुरुपयोग


  • आज राजनीति और समाज दोनों में सम्मान का उपयोग कई बार प्रचार के साधन के रूप में किया जाता है।
  • कुछ लोग सम्मान समारोहों को अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का माध्यम बना लेते हैं।
  • ऐसे आयोजनों में वास्तविक प्रतिभा अक्सर उपेक्षित रह जाती है।
  • जो व्यक्ति वास्तव में समाज के लिए काम कर रहे होते हैं, वे प्रचार से दूर रहते हैं और कई बार सम्मान की दौड़ में पीछे रह जाते हैं।
  • जबकि मंचों पर वे लोग दिखाई देते हैं जिन्होंने स्वयं को प्रस्तुत करने की कला विकसित कर ली है।

सोशल मीडिया और सम्मान की होड़

  • सोशल मीडिया ने सम्मान की अवधारणा को एक नई दिशा दी है।
  • आज सम्मान कई बार वास्तविक उपलब्धि की बजाय फोटो और पोस्ट का विषय बन गया है।
  • कई लोग सम्मान इसलिए चाहते हैं ताकि वे उसे सोशल मीडिया पर प्रदर्शित कर सकें।
  • कुछ संगठनों ने तो सम्मान को सदस्यता और प्रचार का माध्यम बना लिया है।
  • परिणामस्वरूप सम्मान की गंभीरता कम होती जा रही है।
  • सम्मान पाने की नहीं, सम्मान योग्य बनने की आवश्यकता
  • समाज को यह समझना होगा कि सम्मान पाने का सबसे अच्छा मार्ग सम्मान योग्य बनना है।
  • यदि व्यक्ति अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करेगा, ईमानदारी से समाज की सेवा करेगा और अपने कर्तव्यों का पालन करेगा, तो सम्मान स्वयं उसके पास आएगा।

महान व्यक्तियों ने कभी सम्मान की मांग नहीं की।

  • उन्होंने केवल अपना कर्तव्य निभाया।
  • सम्मान उनके पीछे-पीछे आया।

सम्मान देने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारी

  • सम्मान देने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सम्मान केवल योग्य व्यक्तियों को मिले।
  • इसके लिए स्पष्ट मानदंड होने चाहिए।
  • चयन प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।
  • व्यक्ति के कार्यों का मूल्यांकन होना चाहिए।
  • यदि सम्मान केवल औपचारिकता बन जाएगा तो उसकी गरिमा समाप्त हो जाएगी।

समाज को क्या करना चाहिए?

  • समाज को भी सम्मान के प्रति अपनी दृष्टि बदलनी होगी।
  • हमें सम्मानित व्यक्ति की लोकप्रियता नहीं, बल्कि उसके कार्यों को देखना चाहिए।
  • हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि उस व्यक्ति ने समाज को क्या दिया है।
  • यदि समाज सजग होगा तो सम्मान की पवित्रता बनी रहेगी।

निष्कर्ष

सम्मान किसी भी सभ्य समाज की नैतिक पूंजी है। यह केवल एक प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह या मंचीय कार्यक्रम नहीं है, बल्कि समाज द्वारा उत्कृष्टता, सेवा, त्याग और उपलब्धि की सार्वजनिक स्वीकृति है। इसलिए इसका उपयोग अत्यंत सावधानी और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।

अयोग्य और नकारे लोगों को सम्मानित करना केवल योग्य लोगों के साथ अन्याय नहीं है, बल्कि सम्मान की पूरी परंपरा का अपमान है। इससे समाज में गलत संदेश जाता है, प्रतिभाओं का मनोबल टूटता है और सम्मान का मूल्य घटता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सम्मान पाने की लालसा छोड़कर सम्मान योग्य बनने का प्रयास करें। सम्मान कभी मांगा नहीं जाता, खरीदा नहीं जाता और न ही प्रचार के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। वास्तविक सम्मान वही है जो समाज स्वयं किसी व्यक्ति के कर्म, चरित्र और योगदान को देखकर प्रदान करे।

यदि हम सम्मान की गरिमा को बचाना चाहते हैं तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सम्मान केवल उसी को मिले जो वास्तव में उसका अधिकारी हो। क्योंकि जिस दिन सम्मान पात्रता से अलग हो जाएगा, उसी दिन सम्मान शब्द अपनी आत्मा खो देगा।

सम्मान की रक्षा तभी संभव है जब सम्मान का अधिकार केवल योग्य को मिले, न कि केवल इच्छा रखने वाले को।

– डॉ. राकेश दत्त मिश्र
सम्पादक
दिव्य रश्मि
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