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सार-ए-इश्क

सार-ए-इश्क

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"

स्वार्थ की भीड़ में खो गया आदमी,
भूल मानवता को सो गया आदमी।
राह नफ़रत की छोड़ प्रेम-पथ चुने,
हाथ सबका थामे, हो सगा आदमी।
*प्यार सबसे करे, सार इतना रहा।*


कोई जनता का भगवान अब ना रहा,
दिखता कोई अब सद्भावना ना रहा।
ढूँढता फिर रहा बाहरी रोशनी,
भीतर अपना ही दीया जला न सका।
*प्यार सबसे करे, सार इतना रहा।*


झूठ का बोलबाला यहाँ हर कहीं,
सत्य की खोज में अब कोई भी नहीं।
त्याग लोभों का कर, सरल पथ चुने,
सत्य के साथ चल, डर कहीं भी नहीं।
*प्यार सबसे करे, सार इतना रहा।*


मंदिरों-मस्जिदों में बँटा है जहाँ,
ढूँढता फिर रहा अपना ईश्वर कहाँ।
हर हृदय में वही, जो समझ ले अगर,
भेद सारे मिटें, एक दिखे हर जहाँ।
*प्यार सबसे करे, सार इतना रहा।*


मिट रही दूरियाँ, बढ़ रहे फासले,
खो गए प्रेम के अब पुराने सिलसिले।
फिर से रिश्तों में अपनापन जगा,
हाथ थामे चलें, टूटें सारे गिले।
*प्यार सबसे करे, सार इतना रहा।*


"राकेश" लिए प्रेम की जलती मशाल,
मन में रखता सदा एक निर्मल ख्याल।
पथ कठिन है मगर, रुक न पाए कदम,
एक चिंगारी से दीप जलते कई।
प्यार सबसे करे, सार इतना रहा।
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