नृत्य: अंतरात्मा की पुकार और आरोग्य का है आधार

मुजफ्फरपुर (बिहार) । आधुनिक बैले के पितामह 'जीन जॉर्ज नोवेरे' की स्मृति में आयोजित होने वाला अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस आज स्वर्णिम कला केंद्र मुजफ्फरपुर के परिसर में वैचारिक एवं सांस्कृतिक चेतना के साथ मनाया गया। इस अवसर पर समाज के विभिन्न बुद्धिजीवियों ने नृत्य की महत्ता पर प्रकाश डाला और इसे केवल प्रदर्शन की वस्तु न मानकर जीवन जीने की कला करार दिया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं साहित्यकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने नृत्य के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्ष को उजागर किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि:"नृत्य शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की शांति प्राप्त करने का मुख्य जरिया है। जब कोई नर्तक अपनी लय में होता है, तो उसका मस्तिष्क तनाव से मुक्त होकर पूर्णतः एकाग्र हो जाता है। यह एक ऐसी विधा है जो बिना दवाओं के मानसिक विकारों को दूर करने की क्षमता रखती है।" पाठक जी ने आगे जोड़ा कि भारतीय संस्कृति में नृत्य को 'पंचम वेद' का हिस्सा माना गया है, जो न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि शरीर को स्फूर्ति प्रदान कर व्यक्ति को दीर्घायु बनाता है। यूनेस्को की सहयोगी संस्था 'अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान' की अंतरराष्ट्रीय नाच समिति ने वर्ष 1982 में इस दिवस की नींव रखी थी। 29 अप्रैल की तिथि जैन जॉर्ज नोवेरे (1727-1810) को समर्पित है, जिन्होंने नृत्य की दुनिया में क्रांति लाते हुए 'बैले' को एक नया स्वरूप दिया था। आज यह दिवस दुनिया की तमाम सीमाओं को लांघकर एक वैश्विक उत्सव बन चुका है।इस अवसर पर वक्ताओं में स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा एवं कला संस्कृति प्रकोष्ठ आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रभारी डॉ ऊषा किरण श्रीवास्तव ने वर्तमान पीढ़ी में बढ़ते तनाव और गतिहीन जीवनशैली पर चिंता व्यक्त की। उनका मानना था कि यदि नृत्य को शिक्षा और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाया जाए, तो समाज में बढ़ती अवसाद (Depression) जैसी समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। स्वर्णिम कला केंद्र के तत्वावधान में मुजफ्फरपुर में आयोजित इस संवाद ने यह स्पष्ट कर दिया कि कला और साहित्य जब एक साथ मिलते हैं, तो वे समाज को एक नई दिशा देने का सामर्थ्य रखते हैं। कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि नृत्य की इस अनमोल विरासत को भावी पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाए ।
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