बंजर भूमि में उपवन की, तुम ही प्रणेता,
तुमसे ही घर बार, तुम घर की रचयिता।तुम रौनक- सोनचिरैया, इस आँगन की,
तुम ही इस घर आँगन की, धर्म अध्येता।
घर की परिभाषा तुमसे ही पूरी होती,
उपवन में फूलों की चाहत पूरी होती।
रिश्तों के पौधे, लहलहाते चहुँ ओर,
घर की रौनक, बच्चों से पूरी होती।
कभी-कभी कुछ काँटे भी उग आते हैं,
खरपतवार कुछ उपवन में भर जाते हैं।
बड़े जतन से साफ़ सफाई नित करती,
फूलों पर फिर तितली भौरें दिख जाते हैं।
बच्चों को संस्कार, संस्कृति की तुम पोषक,
रिश्तों में व्यवहार, सभ्यता की तुम पोषक।
रहन सहन के ढंग, निभाना तुमने सिखलाया,
रूखी रोटी में अमृत, संतुष्टि की तुम पोषक।
सहनशीलता धरती सी, तुम धारण करती,
रीति रिवाज मर्यादाओं का, पालन करती।
तीज त्योहार पूजा पाठ, अवधारणा तुमसे,
धर्म- कर्म व्रत- अनुष्ठान, परायण करती।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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