देवर्षि नारद: पत्रकारिता के आद्य प्रवर्तक
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय वांग्मय में देवर्षि नारद को केवल एक ऋषि के रूप में ही नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के प्रथम पत्रकार (आदि पत्रकार) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वे सूचना के संचरण, विश्लेषण और उसके सामाजिक प्रभाव के पहले विशेषज्ञ माने जाते है । नारद जी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी निर्बाध गति थी। वे 'त्रिलोक संचारक' थे, जो देवलोक, असुरलोक और मृत्युलोक (पृथ्वी) के बीच सेतु का कार्य करते थे। आधुनिक पत्रकारिता की शब्दावली में कहें तो वे एक 'इंटरनेशनल कॉरेस्पोंडेंट' की तरह थे, जिनकी पहुंच हर सत्ता के केंद्र तक थी। सत्यता और स्रोत: नारद जी कभी भी असत्य सूचना का प्रसार नहीं करते थे। उनकी खबरें प्रामाणिक होती थीं।।लोक कल्याण (Public Interest): उनका मुख्य उद्देश्य 'इदं न मम' (यह मेरे लिए नहीं है) की भावना के साथ जगत का कल्याण करना था। नारद जी की कार्यशैली में आज की पत्रकारिता के कई गुण दिखाई देते हैं:किसी भी महत्वपूर्ण घटना की जानकारी सबसे पहले संबंधित पक्ष तक पहुँचाना। खोजी पत्रकारिता : छिपे हुए तथ्यों को उजागर करना ताकि न्याय की स्थापना हो सके । मध्यस्थता: दो पक्षों के बीच संवादहीनता को दूर करना। पौराणिक कथाओं के अनुसार, नारद जी के जन्म और अस्तित्व के संबंध में विभिन्न मत हैं: ब्रह्मा के मानस पुत्र: सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी ने अपने संकल्प से नारद को उत्पन्न किया। पूर्व जन्म की कथा: 'श्रीमद्भागवत पुराण' के अनुसार, पूर्व जन्म में नारद एक 'दासी पुत्र' थे। साधुओं की सेवा और उनके सत्संग से उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसके बाद अगले कल्प में वे ब्रह्मा के पुत्र के रूप में अवतरित हुए।।माता-पिता: वे ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं, इसलिए ब्रह्मा ही उनके पिता हैं। जहाँ भारत में नारद जी को पत्रकारिता का 'आदि गुरु' माना जाता है, वहीं आधुनिक और पश्चिमी इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित नाम महत्वपूर्ण हैं: जेम्स ऑगस्टस हिकी को 'भारतीय पत्रकारिता का जनक' माना जाता है। उन्होंने 1780 में भारत का पहला अखबार 'बंगाल गजट' निकाला था। भारतेंदु हरिश्चंद्र: इन्हें आधुनिक हिंदी पत्रकारिता का पितामह कहा जाता है। जोहान्स गुटेनबर्ग: मुद्रण कला के आविष्कारक, जिन्होंने सूचना क्रांति की नींव रखी। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की द्वितीया को नारद जयंती मनाई जाती है। इस अवसर पर विश्व संवाद केंद्र द्वारा पत्रकारों को 'नारद सम्मान' से नवाजा जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि एक पत्रकार को नारद जी की ।समाज के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।देवर्षि नारद की पत्रकारिता 'नारद भक्ति सूत्र' की तरह लोक-मंगलकारी थी। उनका 'नारायण-नारायण' का उद्घोष इस बात का प्रतीक है कि सूचना का अंतिम लक्ष्य ईश्वर (सत्य) की प्राप्ति और मानवता का कल्याण होना चाहिए। वे आज के पत्रकारों के लिए सक्रियता, गतिशीलता और सत्यनिष्ठा के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं।
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