आज कल का सच
संजय जैनआज कल का जमाना
मात्र दिखावे का है।
जो न जानता है और
न ही पहचानता है।
बस दौड़े जा रहा है
पर मंजिल न पता है।
गुणगान आधुनिकता का है
पर संसाधनों का अभाव है।।
विद्वमानों ने लिख दिया था
इस कलयुग के बारे में।
पर आज कल की पीढ़ी
समझ नही पा रही है।
चमक धमक के दौर में
नंंगापन दिखा रही है।
शर्म हाया तो बची नही
खुले आम सब कर रही।।
अब के तब के गीतों में
सब कुछ साफ छलक रहा।
दो घूँट पीकर वो अपना
जिस्म दिखाकर लुभा रही।
अच्छे-अच्छे साधु-संतो को
कल युग में ले जा रही।
फिर किससे क्या छुपा है
राज इस कलयुग के।।
बंधन संबंध लोक चार का
क्या दुनिया में कुछ बचा है।
जिसकी लोग दुहाई देते थे
ऐसा सदाचार क्या बचा है।
हम पहले भी आशिक थे
आज भी हमारा हाल वही।
बदला है अगर कुछ तो
नियत और संस्कार वही।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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