नन्हे माली और जादुई आँगन
सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार के अरवल जिले के एक छोटे से गाँव करपी में एक पुराना लेकिन बेहद खूबसूरत घर था। इस घर की दीवारें ईंट और चूने की बनी थीं, जो दशकों के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए थीं। यहाँ दादा जी रहते थे, जो पेशे से एक शिक्षक रहे थे और अब सेवानिवृत्त होकर अपनी पुरानी किताबों और यादों के साथ समय बिताते थे।
१० मई रविवार २०२६ विश्व मातृ दिवस का दिन है और गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थीं। दादा जी के दो पोते, १० वर्षीय दिव्यांशु और ६ वर्षीय प्रियांशु, माता , पिता के साथ शहर से गाँव आए थे। दिव्यांशु गंभीर और समझदार था, जबकि प्रियांशु चुलबुला और जिज्ञासु।
एक सुबह दादा जी ने दोनों को अपने पास बुलाया और कहा, "बच्चों, आज से तीन दिन बाद विश्व मातृ दिवस है। क्या तुम जानते हो कि इस दिन का क्या महत्व है?"
दिव्यांशु ने झट से उत्तर दिया, "जी दादा जी, यह दिन अपनी माँ के प्रति प्रेम और सम्मान प्रकट करने का है।"
दादा जी मुस्कुराए, "बिल्कुल सही! लेकिन असली सम्मान वह है जो हम अपने श्रम और समर्पण से दें। क्यों न इस बार तुम अपनी माँ के लिए कुछ ऐसा बनाओ जो उन्हें हमेशा याद रहे?"
दोनों भाइयों ने तय किया कि वे दादा जी के घर के पिछले हिस्से में पड़े खाली स्थान को एक 'सुंदर उपवन' (बगीचे) में बदल देंगे। उन्होंने इसे नाम दिया— 'माँ का जादुई आँगन'।
काम आसान नहीं था। वहाँ पुरानी ईंटें, पत्थर और खरपतवार फैली हुई थी। दिव्यांशु ने एक बड़ी टेबुल आँगन के बीचों-बीच लगाई, जिसे उसने सजाने की योजना बनाई थी। लेकिन टेबुल का एक पाया टूटा हुआ था।
"भैया, यह टेबुल तो गिर जाएगी!" प्रियांशु ने चिंता जताई।
दिव्यांशु ने इधर-उधर देखा और पास पड़ी एक मज़बूत ईट उठाकर उसे पाए के नीचे लगा दिया। टेबुल अब बिल्कुल स्थिर थी। प्रियांशु ने ताली बजाई, "वाह भैया! आपने तो ईंट को भी काम का बना दिया।
अगले दो दिनों तक दोनों भाइयों ने जी-तोड़ मेहनत की।
प्रियांशु का कार्य: छोटे प्रियांशु ने रंग-बिरंगे बैलून (गुब्बारे) फुलाने की जिम्मेदारी ली। हालाँकि गुब्बारे फुलाते समय उसका चेहरा लाल हो जाता और कई बार गुब्बारे 'ठाँ' करके फट जाते, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
दिव्यांशु का कार्य: दिव्यांशु ने दादा जी की मदद से गमलों में नए पौधे लगाए। उसने माँ की पसंदीदा फूलों की क्यारियाँ बनाईं।
दादा जी दूर बैठे उन्हें देख रहे थे। उन्होंने बच्चों को समझाया, "जैसे एक माली अपने पौधों को सींचता है, वैसे ही एक माँ अपने बच्चों को संस्कारों से सींचती है। आज तुम जो पसीना बहा रहे हो, वह तुम्हारी माँ की ममता का कर्ज उतारने की एक छोटी सी कोशिश है।"
अंततः मातृ दिवस की शाम आ गई। माँ को कमरे से बाहर आने के लिए कहा गया। जैसे ही माँ आँगन में पहुँचीं, उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
आँगन रंग-बिरंगे बैलून से सजा था। बीच में रखी टेबुल पर एक सुंदर सफेद चादर बिछी थी। टेबुल पर गाँव की शुद्ध सामग्री से बना एक केक रखा था। प्रियांशु ने हाथ में चम्मच लेकर माँ को केक खिलाने की तैयारी कर रखी थी। तभी दिव्यांशु ने ऊँचे स्वर में एक स्वरचित कविता पढ़ी:
"मेरी अम्मा सबसे अच्छी, मन की भोली-भाली।
मैं उसके आँगन का बिरवा, वह मेरी है माली॥"
कविता सुनकर माँ की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने दोनों बच्चों को गले लगा लिया
तभी शाम की हल्की हवा चली। टेबुल पर रखा एक छोटा दीया बुझने लगा। प्रियांशु दौड़कर गया और उसने दीये की लौ को अपनी हथेलियों से ढक लिया। दादा जी आगे आए और बोले, "देखा बच्चों! जैसे प्रियांशु ने इस लौ को बुझने से बचाया, वैसे ही माँ हमारे जीवन में ज्ञान और संस्कारों की लौ जलाती है। वह खुद कष्ट सहती है, लेकिन अपने बच्चों पर कभी आंच नहीं आने देती।" माँ ने बच्चों को समझाते हुए कहा, "बेटा, आज तुमने मुझे जो उपहार दिया है, वह बाज़ार के किसी भी महंगे खिलौने से कीमती है। तुमने अपनी मेहनत (वह ईंट लगाना), अपनी कला (गुब्बारे सजाना) और अपने प्रेम (कविता) से यह साबित कर दिया कि तुम एक सच्चे और अच्छे इंसान बन रहे हो।"
उस रात चाँदनी पूरी तरह खिली हुई थी। पूरा परिवार उस टेबुल के चारों ओर बैठा था। बच्चों ने सीखा कि:
माँ का स्थान सर्वोपरि है: वह हमारी पहली गुरु और संरक्षक है। : हाथ से किए गए कार्य में जो सुख है, वह दिखावे में नहीं। : परिवार के बुजुर्ग (जैसे दादा जी) हमें सही राह दिखाते हैं, जिससे हमारी नींव मज़बूत होती है।
"मातृ दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि जीवन भर माँ के प्रति सम्मान, सेवा और प्रेम का संकल्प है। माँ के चरणों में ही स्वर्ग है और उनकी दी हुई शिक्षा ही हमारी असली संपत्ति है।"
बाल कहानी के मुख्य बिंदु:पात्र: दिव्यांशु, प्रियांशु, माँ, पिता जी ,दादा जी। प्रतीक: ईंट (मज़बूत आधार), लौ (ज्ञान), माली (माँ का संरक्षण)। उद्देश्य: बच्चों में पारिवारिक मूल्यों और रचनात्मकता का संचार करना।
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