ज्येष्ठ मास महात्मय {नवां अध्याय}
आनन्द हठीला
स्कन्द जी बोले कि हे ब्राह्मण लोग ! मैं इस विषय में पापनाशिनी पवित्र कथा का वर्णन करूंगा, इसके श्रवण-मात्र से आपलोगों का संशय दूर हो जायगा ॥ १ ॥
विन्ध्यपर्वत के उत्तर भाग में कीर्तिमान्, देवता अतिथि का पूजक मेधावी नामक ब्राह्मणश्रेष्ठ रहता था ॥ २ ॥
गौतम कुल मे उत्पन्न चन्द्रवती नाम की उसकी स्त्री थो। वह स्त्री पतिव्रत धर्म में परायण और पतिसेवा में तत्पर रहा करती थी ॥ ३ ॥
तथा गृहकर्म में लीन सर्वदा प्रिय वचन बोलनेवाली थी । मेधावी नित्य कृषिकर्म को करता था और वाधुपी (व्याज) की वृत्ति (जीविका) को करता था ॥ ४ ॥
बहुत समय बीत जाने पर सन्तान न होने के कारण वह मेधावी अत्यन्त दुखो हो गया और अधिक चिन्ता होने के कारण स्मरण शक्ति से हीन हो गया ॥ ५ ॥
निरन्तर चिन्ता में मग्न रहने के कारण मेधावी को राजयक्ष्मा ( चाय) रोग हो गया। रोगमुक्ति के निमित्त मणि मन्त्र और औषध के द्वारा विविध प्रकार के उपायों को किया ।।६।।
इसके बाद मेधावी को दारुण गलत् कुष्ठ रोग हो गया जिससे वह ब्राह्मणश्रेष्ठ एक पक्ष मास से अधिक जीवन के विषय मे निराश हो गया ॥ ७ ॥
विधि (दैव) तथा उसके अनुसार रोग को देखकर स्वयं भी उसका अनुगामी हो गया। मेधावी ब्राह्मण और उसकी स्त्री दोनों घर से शीघ्र निकल कर गङ्गाजी के तट पर आये ।। ८ ।।
और अपने हाथ से गङ्गा के तट भाग में तुलसी का वन लगाया तथा मेधावी की स्त्री ने अपने पति के साथ रह कर बहुत समय व्यतीत किया ॥ ९ ॥
जब सर्वपापों का नाशक ज्येष्ठ मास आया और ज्येष्ठ मास के नियम व्रत करने से नारद ऋषि वहाँ स्वेच्छा से आये ॥ १० ॥
तव विधिवत् नारद ऋषि को प्रणाम कर यथाविधि उनका पूजन किया तथा समग्र शोक मोह के कारण को भी निवेदन किया ॥ ११ ॥
शोककारण सुनकर प्रसन्नात्मा नारद जी हित वचन बोले कि हे बाले ! पूर्वजन्म में इस ब्राह्मण ने अज्ञानवश मद से उद्धत होकर ॥ १२ ॥
ज्येष्ठ मास के माहात्म्य का अपमान किया। उसी पाप से यह मेधावी पीड़ित हो गया है, इसमें संशय नहीं है ॥ १३ ॥
तुम उस पापदोप के निरासार्थ ज्येष्ठ मास में व्रत करो । जो कि सुख सौभाग्य को देनेवाला और गौरीव्रत नाम से विख्यात है ॥ १४ ॥
इस तरह नारद ऋषि के कहने पर दूरदर्शिनी ब्राह्मणपत्नी चन्द्रवती ने व्रत को स्वीकार कर नारद जी का पूजन किया और उपदेशकर नारद मुनि के चले जाने पर सुश्रोणी चन्द्रवती ने पति के साथ इस पृथिवी पर ॥ १५ ॥
नारद मुनि के कथनानुसार भक्ति-युक्त चित्त से व्रत को किया और व्रत के अनुष्ठानमात्र से मेधावी ब्राह्मणों मे श्रेष्ठ हो गया ॥ १६ ॥
और क्रमशः उस रोग से भी मुक्त हो गया, बाद श्रेष्ठ उद्यापन कर्म कर ब्राह्मणों को पूजन कर तृप्त किया ॥१७॥
धन और अनेकों गोधन देकर अनेक विध पक्वान्न पायस आदि से बहुत से ब्राह्मणों को भोजन कराया ॥ १८ ॥
और स्त्री बान्धवों के साथ स्वयं भी पारण (व्रतान्त भोजन किया तथा बन्धुओं सहित अपने घर आया ॥ १६ ॥
उस मेधावी के आने पर पुरवासियों ने उसके निमित्त महान् उत्सव मनाया। उस उत्सव मे एकत्रित सुहृद पुरवासियों के पूछने पर मेधावी ने सब समाचार कह सुनाया ।॥ २० ॥
उस समय माहात्म्य के श्रवण से सब विस्मित हो गये, और दूसरे अयन (वर्ष) के आनेपर पुत्र के लिये दोनों ने व्रत किया ॥ २१॥
व्रत के प्रभाव से दूसरा कामदेव के समान पुत्र पैदा हुआ। शीघ्र जातकर्म संस्कार कर हजारों गौओं का दान किया ॥ २२॥
ब्राह्मणों को धन वस्त्र अलङ्कार आदि बहुत सा दान कर दिया। यह देखकर विश्वस्त उन पुरवासियों ने भी व्रत किया ॥ २३ ॥
और व्रतप्रभाव से समस्त पुरवासी मानसी चिन्ता वशरीररोग से रहित होकर सुखी हो गये। उस दिन से इस व्रत को बहुत प्रसिद्धि हुई ॥२४॥
प्रथम इस व्रत को समर्थ श्री शिवजी ने पार्वती जी से कहा ।। २५ ।।
और मैंने परम श्रेष्ठ व्रत रहस्य को सक्षेप में तुमसे कहा। श्री स्कन्द जी के वचन को सुनकर ऋपि लोग प्रसन्न हो गये ॥ २६ ॥
और पुष्प वृष्टि करने लगे तथा स्कन्द जी को जीव-जीव (जीवित रहो २) आशीर्वाद देने लगे। इस तरह गिरिजापोत (स्कन्द) जी की स्तुति कर पृथक् पृथक पूजन किया ॥ २७ ॥
और प्रसन्न होकर वे तपोनिष्ठ परस्पर पुनः बोले कि अहो (आश्चर्य है)? हमलोगों ने मासों के बहुत से माहात्म्यों को सुना ॥ २८ ॥
परन्तु ज्येष्ठ मास के एक दिन के साथ भी उनकी तुलना नहीं हो सकती ॥२९॥
इस प्रकार विचार कर श्रेष्ठ ज्येष्ठ मास में स्नान अर्चन क्रिया को सव प्रयत्न से अपने विभव के अनुसार सभी लोगों ने किया ॥ ३० ॥
इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसाद-व्यासेन कृतायां भापाटीकायां नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
क्रमशः...〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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