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तुम्हें देख चाँद भी शर्माए

तुम्हें देख चाँद भी शर्माए

कुमार महेन्द्र
सौंदर्य केवल रूप में नहीं,
संस्कार, सरलता, मर्यादा और मधुर व्यवहार में भी बसता है।
जिस व्यक्तित्व में नेह, अपनत्व और आत्मिक उजास हो —
उसे देख सचमुच चाँद भी शर्मा जाए।

आनन पर मधुमय मुस्कान,
नयनों में नेह सरिता बहती।
मधुर हावभाव अल्हड़ चंचल,
वाणी अमृत सुधा सी रहती।
चाल-ढाल सौम्य सलोनी,
रूप छटा मन वीणा गाए।
तुम्हें देख चाँद भी शर्माए।।


परिधान सुशोभित तन-मन,
आत्मिकता स्पंदन गहरा।
सरल सहज निर्मल वैचारिकता,
लज्जा भाव स्नेहिल चेहरा।
रूप अनुपम मोहक ऐसा,
माधुर्य सुधा जग में बरसाए।
तुम्हें देख चाँद भी शर्माए।।


बिंदी सिंदूर शोभा अनुपम,
चूड़ी-पायल मधुरिम ध्वनि।
अधर सदा मुस्कान सजाए,
वचन बनें खुशियों की रवि।
पुरातनता संग नव चेतन,
हर संवाद अपनत्व जगाए।
तुम्हें देख चाँद भी शर्माए।।


शील, मर्यादा, तेज तपस्या,
संस्कृति-संस्कारों की छाया।
दृढ़ संकल्प नैतिक पथगामी,
हर कदम प्रेरणा दीप जलाया।
सृष्टि-सृजन की दिव्य शक्ति बन,
घर-आँगन मंगल महकाए।
तुम्हें देख चाँद भी शर्माए।।


कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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