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क्या भारतीयों को सोना खरीदने से रोकना परोक्ष रूप से चीन को लाभ पहुँचाना है?डॉ. राकेश दत्त मिश्र

सोना, भारतीय समाज और वैश्विक अर्थव्यवस्था

क्या भारतीयों को सोना खरीदने से रोकना परोक्ष रूप से चीन को लाभ पहुँचाना है?डॉ. राकेश दत्त मिश्र

विश्व अर्थव्यवस्था में सोना केवल एक धातु नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति, सांस्कृतिक विश्वास और वित्तीय सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। आज भी जब वैश्विक बाजार अस्थिर होते हैं, मुद्राएँ कमजोर पड़ती हैं और युद्ध अथवा आर्थिक संकट की आशंका बढ़ती है, तब दुनिया का ध्यान फिर से सोने की ओर जाता है। यही कारण है कि विश्व के दो सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देश भारत और चीन हैं।

भारत में सोने का संबंध केवल निवेश से नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। दूसरी ओर चीन ने सोने को अपनी आर्थिक रणनीति और वैश्विक वित्तीय शक्ति के साधन के रूप में विकसित किया है। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि भारत में लोगों को सोना खरीदने से हतोत्साहित किया जाता है, तो क्या उसका लाभ अंततः चीन को मिलता है?
भारत और चीन : वैश्विक सोना बाजार के दो केंद्र

विश्व स्वर्ण परिषद (World Gold Council) के अनुसार विश्व में सबसे अधिक सोना खरीदने वाले देशों में भारत और चीन लगातार शीर्ष पर रहते हैं। चीन में सोने की खरीद निवेश, तकनीकी उद्योग और सरकारी भंडारण के लिए होती है, जबकि भारत में इसका सबसे बड़ा आधार पारिवारिक बचत, विवाह संस्कार और सांस्कृतिक परंपरा है।

भारत के गाँवों और छोटे शहरों में आज भी सोना आर्थिक सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय माध्यम माना जाता है। बैंकिंग व्यवस्था की सीमाओं, शेयर बाजार की अनिश्चितताओं और मुद्रास्फीति के बीच सामान्य भारतीय परिवार सोने को “संकट का साथी” मानता है।

यदि भारत में सोने की मांग कम होती है, तो वैश्विक बाजार में उपलब्ध अतिरिक्त सोना स्वाभाविक रूप से अन्य बड़े खरीदार देशों, विशेषकर चीन, की ओर जाएगा। चीन पहले से ही अपने केंद्रीय बैंक के माध्यम से लगातार स्वर्ण भंडार बढ़ा रहा है। वह डॉलर आधारित वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के विकल्प के रूप में सोने को रणनीतिक हथियार की तरह देख रहा है।
सोना और राष्ट्रीय आर्थिक शक्ति

इतिहास गवाह है कि जिन देशों के पास अधिक स्वर्ण भंडार रहा, वे आर्थिक संकटों में अपेक्षाकृत अधिक स्थिर रहे। अमेरिका, रूस, चीन और भारत जैसे देश लगातार अपने स्वर्ण भंडार को मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।

भारत में आम जनता के पास अनुमानतः हजारों टन सोना है, जिसे कई अर्थशास्त्री “जनता का स्वर्ण भंडार” कहते हैं। यह केवल व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की अप्रत्यक्ष आर्थिक शक्ति भी है। संकट के समय यही संपत्ति देश की वित्तीय स्थिरता में सहायक हो सकती है।

यदि भारतीय समाज को लगातार यह कहा जाए कि सोना खरीदना अनुपयोगी है या केवल विलासिता है, तो इससे भारत की पारंपरिक बचत व्यवस्था कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर चीन अपनी जनता और सरकारी संस्थाओं दोनों स्तरों पर सोना संग्रह बढ़ा रहा है। ऐसी स्थिति में वैश्विक स्वर्ण शक्ति का संतुलन चीन की ओर झुकना स्वाभाविक है।
भारतीय संदर्भ में सोने का महत्व

भारत में सोना केवल आभूषण नहीं है। यह:

परिवार की आर्थिक सुरक्षा है,


महिलाओं की सामाजिक शक्ति है,


ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बचत है,


और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।

भारतीय समाज में सदियों से सोना कठिन समय में सहारा देने वाला साधन रहा है। कृषि संकट, बीमारी, शिक्षा या सामाजिक आवश्यकताओं के समय यही सोना परिवारों के काम आता है। इसलिए भारतीय मानसिकता में सोना “मृत निवेश” नहीं बल्कि “विश्वसनीय संपत्ति” माना जाता है।
क्या सोना खरीदने से रोकना चीन को लाभ पहुँचाता है?

यह कथन पूरी तरह आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो इसमें आंशिक सत्य अवश्य दिखाई देता है। वैश्विक बाजार में मांग और आपूर्ति का सिद्धांत काम करता है। यदि भारत जैसे विशाल बाजार में मांग घटती है और चीन लगातार खरीद बढ़ाता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण व्यापार में चीन की स्थिति अधिक मजबूत होगी।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी भी देश की आर्थिक नीति केवल सोना खरीदने या न खरीदने पर आधारित नहीं होती। सरकारें कई बार विदेशी मुद्रा संतुलन, आयात व्यय और निवेश को अन्य क्षेत्रों में बढ़ाने के उद्देश्य से लोगों को वैकल्पिक निवेश की सलाह देती हैं।

फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारत की पारंपरिक स्वर्ण-संपदा और जनता की बचत क्षमता देश की आर्थिक शक्ति का एक बड़ा आधार है। यदि इसे कमजोर किया जाता है और उसी समय चीन अपने स्वर्ण भंडार को लगातार बढ़ाता है, तो वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा में उसका लाभ बढ़ना स्वाभाविक है।
निष्कर्ष

भारत और चीन के बीच केवल सीमा या व्यापार की प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि आर्थिक प्रभाव और वित्तीय शक्ति की भी प्रतिस्पर्धा है। सोना इस शक्ति-संतुलन का एक महत्वपूर्ण तत्व बन चुका है।

भारतीय समाज के लिए सोना केवल धातु नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। इसलिए किसी भी आर्थिक विमर्श में सोने के महत्व को केवल उपभोग की दृष्टि से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक शक्ति और सामाजिक संरचना के संदर्भ में भी समझना होगा।यदि भारत अपनी पारंपरिक स्वर्ण-संपदा को सुरक्षित रखता है और विवेकपूर्ण आर्थिक नीति अपनाता है, तो यह देश की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता में सहायक सिद्ध हो सकता है। वहीं यदि भारत की मांग कमजोर होती है और चीन लगातार स्वर्ण भंडार बढ़ाता है, तो वैश्विक आर्थिक संतुलन पर उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

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