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तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय

तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय

कुमार महेंद्र
जब पहली बार नज़रों से नज़रें मिलती हैं,
तो मन के उपवन में प्रेम स्वतः अंकुरित हो उठता है…
भावों की रिमझिम, मुस्कान की चांदनी और अपनत्व की सौंधी महक—
यही तो है सच्चे प्रणय का प्रारंभ।
"तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय" — एक कोमल प्रेमानुभूति 💞
✍️ कुमार महेंद्र

अंग-प्रत्यंग नव यौवन,
घट-घट उमंग लहरियाँ।
संवाद-पटल का माधुर्य,
अंतर आनंद की अठखेलियाँ।
बारिश-बूंदों सी मस्ती,
संबंधों में अपनत्व लय।
तुम्हें देखकर, अंकुरित प्रणय।।


स्वर मधुरिमा रिमझिम,
जीवन उत्सवी अनुपमा।
हरित श्रृंगार मनोरम,
दुल्हन-सा प्रणय रमा।
रग-रग मिलन तरुणाई,
तृषा-तृप्ति भाव विलय।
तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय।।


हिय-पटल का नेह सरोवर,
अभिव्यक्ति भाव अंतरंग।
शब्द-सुरभि चाह ओतप्रोत,
चारु चंद्र-सी मुस्कान संग।
निशि-दिन रमणीक प्रभा,
यौवन उत्कंठा संसर्गमय।
तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय।।


अति सुरभित मन-उपवन,
विचार-तरंगिनी अनुपम।
चाल-ढाल अति मनोहर,
हाव-भाव मंगल उत्तम।
तन-मन मंदिर-सा पावन,
अंतःकरण में नेह संचय।
तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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