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ज्येष्ठ मास महात्मय {तृतीय अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {तृतीय अध्याय}

आनन्द हठीला
स्कन्द जी बोले कि हे सुनि लोग ! समस्त पापों का नाश करने वाला ज्येष्ठ मास के दिनो का माहात्म्य और सम्पूर्ण जल दान का माहात्म्य आप सब लोग श्रवण करे ॥ १ ॥

ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से लेकर ज्येष्ठ शुक्ल दशभी पर्यन्त पवित्र दशहरा नामक व्रत करना चाहिये ॥ २ ॥

प्रतिदिन गङ्गाजी के पवित्र जल में स्नान करना चाहिये । समस्त तीर्थों के अभाव मे जो भी जल मिले वह सब गङ्गाजल के समान जल कहा है ॥ ३ ॥

इन दस दिनों मे जो स्नान करता है वह शतजन्म के अर्जित दशविध पापों से मुक्त हो जाता है। दशविध पापो में पाँच महापाप और पॉच लघु पाप हैं ।॥ ४ ॥

इस तरह दशविध पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है। इन दिनों में अनेक दानों को देना चाहिये, वे दिये गये सब दान अक्षय हो जाते हैं ।॥ ५ ॥

हे ब्राह्मण लोग ! ज्येष्ठ शुक्लपक्ष की द्वितीया के दिन अपराह्न समय मे प्रसिद्ध समान नामक कल्प प्रारम्भ हुआ ॥ ६ ॥

उस द्वितीया के दिन समान नामक कल्प मे स्नान दान श्राद्ध ब्राह्मण भोजन कर्म को विष्णु भगवान् के निमित्त भक्ति से जो करते हैं उनको कोटि गुणा अधिक पुण्य होता है ॥ ७ ॥

और ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया के दिन पञ्चाग्नि साधन नामक व्रत आरम्भ होता है। पञ्चाग्नि साधन व्रत एक मास तक करने से समस्त पापों से छूट जाता है ॥ ८ ॥

और तेज में सूर्य के समानहोता है इसमे संशय नहीं हैं। इसी तृतीया के दिन विशेष रूप से पवित्र रम्भाव्रत करना चाहिये ॥ ६ ॥

सधवा या विधवा सभी स्त्रियों इस व्रत को सौभाग्य सिद्धि के लिये करती है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! इसी तृतीया के दिन वामन कल्प का प्रारम्भ हुआ ॥ १० ॥

इसलिये तृतीया के दिन दही चावल का दान करने से वामन भगवान् सन्तुष्ट होते है और विधि से श्राद्ध, तर्पण, ब्राह्मणभोजन कर्म को करे ॥ ११ ॥

तथा एक मास तक ब्राह्मणों को दही का भोजन करावे और शुक्ल चतुर्थी के दिन कपिल ऋषि के पवित्र आश्रम म ॥ १२ ॥

कुण्ड से चार बुजाधारी विनायक (गणेश जी) देव प्रकट हुए। इसलिये चतुर्थी के दिन भोजन न करे और सब लोग गणेशजी का महोत्सव करें ॥ १३ ॥

पञ्चमी के दिन घृतपक्व अपूप (मालपुआ) आदि ब्राह्मणों को भोजन करावे । पहिले इसी शुक्ल चतुर्थी के दिन सती उमा प्रकट हुईं ॥ १४ ॥

इसलिये चतुर्थी के दिन लियों सौभाग्यवृद्धि के लिये उमा (पार्वती) का विविध उपचारो से पूजन करे । और गीत (गाना) नृत्य (नाच) आदि उत्सव करें ।॥ १५ ॥

सन्तान की इच्छा हो तो शुक्ल पष्ठी के दिन स्त्रियों जल वस्त्र पुष्प सुगन्ध वस्तु हवन आदि के द्वारा उमा (पावती) का पूजन कर ॥ १६ ॥

ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी के दिन ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्त में जो उमा का पूजन नहीं करते हैं उनके यहाँ ज्येष्ठा (दरिद्रा देवी) का वास होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १७ ॥

इसलिये दरिद्रा से भयभीत मनुष्यों को सप्तमी के दिन उमा का पूजन और दशमी के दिन अपने विभव विस्तार के अनुसार गङ्गाजी का पूजन करना चाहिये ॥ १८ ॥

जिस कारण लोकपावनी गङ्गा दशमी के दिन स्वर्ग से अवतीर्ण हुई अतः १०,११, १२ इनतीन दिन से एकादशी का व्रत साध्य कहा है॥१६॥

एकादशी का व्रत समस्त पापों का नाशक है इसका व्रत निर्जल उपवास करने से सिद्ध होता है। और त्रयोदशी से लेकर पौर्णमासी पर्यन्त तीन दिन का जो उत्तम व्रत कहा है ॥२०॥

यह व्रत सावित्री नाम से प्रसिद्ध त्रियों के सौभाग्य को देने वाला है। उन दिनों मे वटवृक्ष के मूलभाग का जल से सिञ्चन करे और वटवृक्ष के समीप ब्रह्मा, यमराज ॥२१॥

सत्यव्रत और सावित्री का पूजन करे। इस तरह निद्रा आहार (भोजन) का त्याग कर तीन दिन व्रत करे ॥ २२ ॥

इसी तरह कृष्ण पक्ष में भी तीन दिन का व्रत करके प्रतिपत् के दिन पारण करे। यह नित्य व्रत है, स्त्रियों इस व्रत को सदा करें, यह श्रेष्ठ व्रत एक वर्ष करने से सिद्ध होता है ॥२३॥

ज्येष्ठ मास की पौर्णमासी ज्येष्ठा नक्षत्र से युक्त हो तो वह कोटि शत पर्व से भी श्रेष्ठ है, उसे ज्येष्ठ पौर्णमासी के दिन अनेक दानों को देवे । मैं उन दानों को संक्षेप में कहता हूँ ।॥ २४ ॥

हे तपोधन लोग ! ज्येष्ठीं पौर्णमासी के दिन कूर्मकल्प आरम्भ हुआ, इसलिये उस दिन स्नान दान तर्पणब्राह्मणभोजन ।। २५ ।।

पितरों के उद्देश्य से जो लोग करते हैं वे लोग परमपद को जाते है। हे भूसुर (पृथिवी के देवता ) ! सत्युग के आरम्भ में जिस ज्येष्ठी पौर्णमासी के दिन मन्वन्तर कल्प आरम्भ हुआ ।। २६ ।।

इसलिये उस दिन श्राद्ध दान करना पितरों को तृप्तिदायक कहा है। इस तरह देवताओं से पूजित इस ज्येष्ठ मास में बहुत से व्रत कहे हैं ।॥ २७ ॥

इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसाद-व्यासेन कृतायां भाषाटीकायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

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