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विश्व सौर संस्कृति का उद्भव

विश्व सौर संस्कृति का उद्भव

सत्येन्द्र कुमार पाठक
सनातन परंपरा में सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि 'साक्षात् देव' हैं। वेदों ने उद्घोष किया— "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" (सूर्य इस जड़ और चेतन जगत की आत्मा है)। सौर संस्कृति विश्व की वह आदिम कड़ी है जिसने मनुष्य को पहली बार समय, ऋतु और ऊर्जा के अनुशासन से जोड़ा। मगध की भूमि इस वैश्विक सौर चेतना का केंद्र बिंदु रही है। सौर वंशावली और परिवार: सौर संस्कृति का आधार भगवान सूर्य का स्वरूप और उनका वृहद परिवार है। महर्षि कश्यप और अदिति के बारह पुत्र 'द्वादश आदित्य' कहलाए। ये बारह आदित्य वर्ष के बारह मासों के अधिष्ठाता हैं: । विवस्वान: वर्तमान मन्वंतर के सूर्य। अर्यमा: पितृलोक के देव। मित्र: मैत्री और प्रकाश के देव। वरुण: जल और व्यवस्था के देव। पर्जन्य, अंश, भग, धाता, इन्द्र, पूषा, त्वष्टा और विष्णु अन्य आदित्य हैं। भगवान सूर्य का परिवार पत्नियां: संज्ञा और छाया। संतान: यम (न्याय के देव), यमुना (पापनाशिनी नदी), शनि (कर्म फलदाता), और वैवस्वत मनु है। प्राचीन मगध (कीकट प्रदेश) सौर उपासना का वैश्विक केंद्र कैसे बना, इसकी कथा 'भविष्य पुराण' और 'साम्ब पुराण' में वर्णित है। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हुआ था। नारद मुनि के परामर्श पर साम्ब ने चंद्रभागा नदी के तट पर सूर्य की आराधना की। सूर्य देव ने उन्हें 'शाकद्वीप' (प्राचीन ईरान/मध्य एशिया) से 'मग' ब्राह्मणों को लाने का निर्देश दिया, क्योंकि वे ही सूर्य की विधिवत पूजा के ज्ञाता थे। ये 'मग' ब्राह्मण मगध में आकर बसे और यहीं से सौर संस्कृति का शास्त्रीय विस्तार हुआ। उमंगा , देव (औरंगाबाद): यहाँ का सूर्य मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है, जिसका मुख पश्चिम की ओर है। उलार (पालीगंज), पंडारक , बेलाउर, ओंगारी , हंडिया में राजा साम्ब द्वारा स्थापित १२ प्रमुख स्थलों में से एक।दक्षिणार्क (गया): भगवान राम द्वारा पिता दशरथ के निमित्त पिंड अर्पण के समय सूर्य पूजा का प्राचीन केंद्र है। जरासंध और वृहद्रथ काल - मगध सम्राट जरासंध और उनके पूर्वज वृहद्रथ सूर्य के परम भक्त थे। उनके काल में राजगीर और उसके आसपास के 'तपोवन' क्षेत्र सूर्य चिकित्सा के केंद्र थे। कीकट और अंग साम्राज्य में अंगराज कर्ण, जो स्वयं सूर्य पुत्र थे, मुंगेर के गंगा तट पर सूर्य की कठिन साधना करते थे। उनके द्वारा शुरू की गई 'दान' और 'अर्घ्य' की परंपरा आज भी बिहार के जन-जीवन में रची-बसी है। वैश्विक परिदृश्य: सात महाद्वीपों में सूर्य - सौर संस्कृति केवल भारत तक सीमित नहीं रही। 'मग' ब्राह्मणों के माध्यम से यह विद्या पूरे विश्व में फैली है। ईरान में सूर्य को 'मिथिरा' कहा गया। वहां के शिलालेखों में सूर्य को 'महान प्रकाश' माना गया है। इराक (मेसोपोटामिया) में सूर्य देवता 'शमाश' न्याय के देवता थे। मिस्र (Egypt): रा का साम्राज्य में मिस्र की सभ्यता पूर्णतः सौर केंद्रित थी। वहां के फिरौन (Pharaohs) स्वयं को सूर्य पुत्र 'रा' (Ra) का प्रतिनिधि मानते थे। पिरामिडों का कोण सूर्य की किरणों के अनुसार निर्धारित किया जाता था।अमेरिका और यूरोप का अमेरिका: माया और एज़्टेक सभ्यताओं में भव्य सूर्य मंदिर मिले हैं।इंग्लैंड: स्टोनहेंज (Stonehenge) एक प्राचीन सौर वेधशाला है।जापान: आज भी जापान को 'उगते सूर्य का देश' कहा जाता है और वहां की राजकुल परंपरा सूर्य देवी 'अमातेरासु' से जुड़ी है। वैदिक गायत्री मंत्र और सांध्य उपासना।बौद्ध 'मारीचि' और प्रकाश पुंज का दर्शन।जैन ज्योतिष्क देवों में सूर्य का सर्वोच्च स्थान।ईसाई 'संडे' (Sunday) और ईसा मसीह को 'जगत की ज्योति' मानना।इस्लाम कुरान की 'सूरा-अश-शम्स' जहाँ सूर्य की शपथ ली गई है। स्थापत्य और खगोलीय विज्ञान में प्राचीन सूर्य मंदिरों का निर्माण खगोलीय सटीकता पर आधारित था। कोणार्क (ओडिशा): मंदिर का पहिया समय की गणना करता है। मार्तंड (कश्मीर): पहाड़ों के बीच सूर्य की पहली किरण को पकड़ने के लिए निर्मित। मोढेरा (गुजरात): विषुव (Equinox) के दिन सूर्य की किरणें सीधे मूर्ति पर पड़ती हैं।
आज जिसे हम 'सोलर एनर्जी' कहते हैं, वह प्राचीन ऋषियों के 'सूर्य चिकित्सा' का ही विस्तार है। विटामिन डी और आरोग्य: सूर्य की किरणों से असाध्य रोगों का उपचार प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है। छठ महापर्व विज्ञान और आस्था का संगम है। डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देना सौर ऊर्जा के संरक्षण और कृतज्ञता का प्रतीक है। वसुधैव कुटुंबकम और सौर चेतना में सूर्य एक है, उसकी रश्मियाँ एक हैं। मगध से शुरू हुई यह सौर यात्रा ईरान, मिस्र और अमेरिका होते हुए आज वैश्विक अक्षय ऊर्जा का आधार बनी है। 'मग' ब्राह्मणों ने जिस ज्ञान का बीजारोपण मगध की उर्वर भूमि पर किया था, वह आज भी हमें अंधकार से प्रकाश की ओर (तमसो मा ज्योतिर्गमय) ले जाने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
संदर्भ - भविष्य पुराण: ब्राह्म पर्व (मग और शाकद्वीप वर्णन)। साम्ब पुराण: सूर्य उपासना और साम्ब की कथा। ऋग्वेद: सौर सूक्त और गायत्री मंत्र , सूर्य पुराण , विष्णु पुराण , ब्रह्म पुराण , मगध का इतिहास: विभिन्न शिलालेख और पुरातात्विक साक्ष्य। अवेस्ता: पारसी सौर मंत्र। आदित्य हृदय स्तोत्र: वाल्मीकि रामायण।


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