तुम मलयागिरि की मलय सुगंध हो
कुमार महेंद्रतुम सिर्फ एक एहसास नहीं,
मन की गहराइयों में बसी वो मधुर सुगंध हो
जो हर पल को प्रेम से महका देती है…
“तुम मलयागिरि की मलय सुगंध हो”
शुभ्र ज्योत्स्ना सा मुखमंडल,
अंतर-पटल प्रीति निर्झर।
पुलकित प्रफुल्लित आभा में,
आनंद-धार झर-झर ।
मानस-बिंब मस्त मगन,
प्रीत-रीत दिव्य अनुबंध हो।
तुम मलयागिरि की मलय सुगंध हो।।
प्रति पल मिलन की उमंग लिए,
स्मृति-पट मोहिनी छवि रूप।
श्रृंगार सुघर, सरस सुकुमार,
स्नेह-बिंब अनुपम अनूप।
यौवन-लहरी मधु-अर्णव सी,
नयनों में प्रणय स्वच्छंद हो।
तुम मलयागिरि की मलय सुगंध हो।।
सान्निध्य-सुधा उल्लास भरे,
स्वप्नों की माला सजीवंत।
चाल-ढाल में छवि चितचोर,
सौंदर्य-अर्चना बलवंत ।
हिय में बसती रसिक भामिनी,
मुस्कान भरा मृदुल संबंध हो।
तुम मलयागिरि की मलय सुगंध हो।।
अंतःकरण प्रेम-सरोवर,
भावों की लहरें अतरंग।
शब्द-माधुर्य राग-अथाह,
चारु-चंद्र सी चंचल तरंग।
निशि-दिन रम्य प्रभा बिखरे,
तारुण्य-रस स्नेहिल बंध हो।
तुम मलयागिरि की मलय सुगंध हो।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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