नर्मदा की लहरों पर, ममता का मौन बलिदान
कुमार महेंद्रलहरों ने सब कुछ छीन लिया,
पर माँ का प्रेम अमर कर दिया....
एक क्रूज था सपनों का,
जो बन गया मौत का जहाज़।
हँसी की फुलझड़ियाँ बुझीं,
खामोश हुई हर आवाज़।
एक पल में सब डूब गया,
छा गया गहन तम का वितान।
नर्मदा की लहरों पर, ममता का मौन बलिदान।।
फिर भी उस प्रलय-क्षण में,
एक दीपक-सा उजियारा।
माँ ने अपने आँचल में,
थाम लिया जग सारा।
मौत की आँधी के सम्मुख भी,
अडिग रही माँ की शान।
नर्मदा की लहरों पर, ममता का मौन बलिदान।।
चार वर्ष का वह नन्हा,
माँ की छाती से लगा रहा।
जैसे सारा ब्रह्मांड,
उसके आँचल में सिमटा रहा।
लहरों ने रौद्र रूप धरा,
मृत्यु का तांडव महान।
नर्मदा की लहरों पर, ममता का मौन बलिदान।।
लाइफ जैकेट से बँधी रही,
दो जीवन की डोर।
एक ही धड़कन बन गए,
एक ही श्वास, एक ही ठौर।
डूबे तो साथ ही डूबे,
अमर हुआ उनका गान।
नर्मदा की लहरों पर, ममता का मौन बलिदान।।
शायद अंतिम साँसों में,
माँ ने यही कहा होगा—
“मत डर बेटा, मैं हूँ न…”
और उसे सीने से लगा होगा।
ममता की उस गहराई को,
नाप सका न कोई जहान।
नर्मदा की लहरों पर, ममता का मौन बलिदान।।
वो माँ मरीना देवी,
अमर हुई उस क्षण में।
और नन्हा सा वह जीवन,
सो गया माँ के आँचल में।
मृत्यु भी झुककर देखे,
ऐसा अनुपम स्नेह वरदान।
नर्मदा की लहरों पर, ममता का मौन बलिदान।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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