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खिसकती जिंदगी

खिसकती जिंदगी

जय प्रकाश कुवंर
सुबह हुआ, दोपहर हुआ,
अब सांझ ढल रही है।
जिंदगी आहिस्ता आहिस्ता,
मंजिल की ओर बढ़ रही है।।
एक फूल जो कभी खिला था,
अब झुककर मुरझा रहा है।
अब सुखकर डाली से झड़ने का,
दिन नजदीक आ रहा है।।
मित्रों एवं शुभचिन्तकों यह,
आपके दुआओं का असर है।
कि ,दिमाग अभी तक सक्रिय है,
और शरीर भी कारगर है।।
हजारों उलझनों से लड़ते हुए,
जिंदगी आगे निकल रही है।
सुबह हुआ, दोपहर हुआ,
अब सांझ ढल रही है।
जिंदगी आहिस्ता आहिस्ता,
मंजिल की ओर बढ़ रही है।।
🌹🌹🌹🥀🥀🥀
मित्रों, आज मेरा जन्मदिन है।
आज मैं ७८ साल का हो गया हूँ।
ईश्वर की असीम कृपा और आप सभी
दोस्तों, मित्रों एवं शुभचिन्तकों की
शुभकामनाओं एवं आशीर्वाद से
स्वस्थ रहते हुए जीवन की इस
मंजिल तक पहुँच पाया हूँ।
भविष्य के लिए भी आप सभी से
आशीर्वाद की कामना करता हूँ।
🙏🙏👏👏🙏🙏

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