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शब्दवीणा सृजन त्रिविधा में देवघर के कवियों ने बटोरीं वाहवाहियाँ

शब्दवीणा सृजन त्रिविधा में देवघर के कवियों ने बटोरीं वाहवाहियाँ

  • कभी-कभी सुनसान डगर पर, दो-दो पथ आ मिलते हैं
  • तू बोलता रहा, मैंने मौन चुन लिया
  • सुनो दीपकों जलो, सभ्यता को ज्योर्तिमय कर जाओ
  • तेरी राह तकते हैं दिन-रात हम, कि कब आ रहे हो मेरे घर के द्वारे

गया जी। राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था 'शब्दवीणा' द्वारा आयोजित होने वाले साप्ताहिक कार्यक्रम 'शब्दवीणा सृजन त्रिविधा' में देवघर, झारखंड से आमंत्रित शब्दवीणा देवघर जिला समिति के प्रचार मंत्री वरिष्ठ कवि धीरेंद्र छतहारवाला, सचिव कवि तथा उपन्यासकार डॉ परशुराम तिवारी 'भार्गव', एवं कवि पुनीत कुमार दुबे ने विविध विषयों पर स्वरचित गीत, गज़ल, मुक्तक, और दोहे पढ़े। कार्यक्रम की संयोजिका व शब्दवीणा की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी ने मंचासीन सभी प्रतिभागियों, सभी दर्शकों, एवं श्रोताओं का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन कर रहीं शब्दवीणा सृजन त्रिविधा प्रभारी व हरियाणा की कवयित्री कीर्ति यादव ने मंचासीन अतिथि रचनाकारों को उनका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय देते हुए काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ परशुराम तिवारी ने सुमधुर स्वर में प्रस्तुत स्वरचित सरस्वती वंदना एवं भगवान शिव को समर्पित भजन से किया।

डॉ तिवारी की ग़ज़ल "तू बोलता रहा, मैंने मौन चुन लिया। तेरी बातों को दिल में दफन कर लिया" को दर्शकों एवं श्रोताओं से खूब सराहना मिली। उन्होंने अपनी रचना "सती का संदेश" मातृशक्ति एव नारियों को समर्पित किया। धीरेंद्र छतहारवाला की रचना "डगर" का पाठ करते हुए कहा, "कभी-कभी सुनसान डगर पर दो-दो पथ आ मिलते हैं। कितनी बार संभालोगे तुम, विदा करो हम चलते हैं। हम तो हैं पतझड़ के पत्ते, जाने कहाँ ठिकाना होगा। किन गाँवों की शरण मिलेगी, किस-किस पथ पर जाना होगा। एक तुम्हारी आस यहाँ पर, जिसपर यहाँ मचलते हैं" ने खूब वाहवाहियाँ बटोरीं। कवि पुनीत कुमार दुबे ने "मेरे बच्चे दो दिन से भूखे हैं, खुदा के वास्ते मुझे काम दे दो। अगर कहानी में टूटना लिखा ही है तो इस गलतफहमी को अंजाम दे दो" ग़ज़ल पढ़ी। कार्यक्रम संचालिका कीर्ति यादव ने "तेरी राह तकते हैं दिन-रात हम, कि कब आ रहे हो मेरे घर के द्वारे" गीत की सुमधुर प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर डाला।

कार्यक्रम का समापन डॉ रश्मि प्रियदर्शनी की रचना "दीप नहीं हम दिनकर हैं" से हुआ। अंधकार और प्रकाश के बीच युग-युगांतर से जारी युद्ध को प्रतीकों के माध्यम से दर्शाते हुए डॉ रश्मि ने अंधकार के छद्मवेशी चरित्र को चित्रित किया। डॉ रश्मि की "अंधकार ने अंधकार से कहा, "पास मेरे आओ। गठबंधन करके मुझसे, सारे समाज पर छा जाओ। हाथ पकड़कर साथ तुम्हारे निर्भय मुझको चलने दो। बता स्वयं को दिव्य, नेत्रहीनों को ठगने, छलने दो। दूर रखो दीपों को, उन्हें भूलकर भी मत जलने दो। जहाँ दिखे जलता दीपक, चुपके से उसे बुझा जाओ" पंक्तियों को सभी से सराहना मिली। समाज के संघर्षरत दीपकों को संबोधित करते हुए डॉ रश्मि ने कहा कि, "सुनो दीपकों जलो, सभ्यता को ज्योर्तिमय कर जाओ। बनो बुद्ध-से वीर, तपस्वी, पुंडरीक-से खिल जाओ।"

शब्दवीणा सृजन त्रिविधा का सीधा प्रसारण शब्दवीणा केन्द्रीय पेज से किया गया, जिससे जुड़कर प्रो. सुनील कुमार उपाध्याय, डॉ विजय शंकर, सुरेश गुप्ता, जैनेन्द्र कुमार मालवीय, सुरेश विद्यार्थी, पुरुषोत्तम तिवारी, पी. के. मोहन, महावीर सिंह वीर, अजय कुमार, दीपक कुमार, महेश चंद्र शर्मा राज, बबन बदिया, ललित शंकर, सुरजीत झा, डॉ वीरेंद्र कुमार, अनुराग सैनी मुकुंद, डॉ रवि प्रकाश एवं अनेक श्रोताओं ने कार्यक्रम का आनंद उठाया और अपनी टिप्पणियों से रचनाकारों का उत्साहवर्द्धन किया।

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