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बहु प्रतिक्षित बदरीनाथ यात्रा

बहु प्रतिक्षित बदरीनाथ यात्रा

डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
अपने संबंधी पुत्र श्रवण से बदरी नाथ धाम जाने की अभीलाषा प्रकट की । उसके माध्यम से संजीव कुमार जी मिले जिन्होने हमारी यात्रा के सपने में पंख लगाकर उसे कार्यान्वित कर दिया । इनसे मेरा साक्षात्कार तो नहीं हुआ परंतु इतना न कहना अन्याय होगा कि इनका स्वभाव सरल है , बात को दृढ़ता से अनुपालित करते हैं ।यात्रियों की सुविधा का खूब ख्याल रखते हैं ,समय समय पर रास्ते का मोनोटरिंग करते रहते हैं ।अन्य एजेंसियों से दन उगाही भी कम है।इन्होने जो दाड़ी दी थी ,चालक उसका बड़ा ही कुशल था,गाड़ी भी अच्ढी ञी ।इनके कारण ही हमारी यात्रा सफल हो सकी ,क्यों कि हम सभी 75+ थे ।
बचपन में मामा (दादी ) बराबर कहा करती थी -
-जे जाय बदरी ,से न आबे उदरी ।
अयबो करे तो कभी न होय दरिदरी ॥
इसी मंत्र को जीवन का ध्येय मान कर बदरीविशाल भगवान के दर्शन की अभिलाषा उत्कंठा में परिणत हो गई थी ।यह अभिलाषा सिर्फ मेरे मन में नहीं थी ,कई लोग इस उत्कंठा के शिकार हो रहे थै ।डॉ रामकृष्ण मिश्र(82 वर्ष) और डॉ सुदर्शन शर्मा (64 वर्ष ),दोनो ने मिलकर मेरे साथ एक घुमंतु टीम बनाई ।इस टीम की यात्राएँ कई हुईं ,परंतु इसका श्री गणेश इसी बदरीधाम और केदार धाम से होना था ।रेल के रिजर्वेशन ए सी द्वितीय श्रेणी में और फिर तृतीय श्रेणी में करबा -करबा कर कैंसिल करबाते रहे ।कभी बाढ़ तो कभी ग्लैसियर का कमाल हमारी यात्रा पर तेजाब डालते रहे ।हर वार हमारी यात्रावली अपना रूट बदलती रही ।धन्य हो आ॰ सत्यनारायण जी का जिनके आमंत्रण ने हमारे सपने को साकार कर नारायण तक पहुँचाने मे उत्प्रेरक का काम किया ।हालॉ कि आमंत्रित करने का बाद से उनका संपर्क टूट गया ।एक वार तो लगा कि फिर ग्रहण लग गया ,परंतु नारायण ने सत्यनारायण के वहाने बुलाया था ,इसलिए यह अटल था ।वल्कि इस वार तीन नहीं चार सदस्यीय टीम बनी - डॉ शशिभूषण मिश्र जी के साथ । सुवह चार बजे गया में स्टेशन पहुँचाने का जिम्मा डॉ शक्ति कुमार जी ने लिया ।
हमारी टीम साढ़े चार बजे गया स्टेशन पर आ गई थी ।गाड़ी समय से प्लेटफॉर्म एक के बदले दो पर आई ।एक पर गाड़ी पकड़ना आसान होता है परंतु संख्यावल के कारण दो भी आसान ही लगा ।गाड़ी पर सबार हुए ,समय से गाड़ी खुली ।सबकी सीट एक ही बॉगी में एक ही जगह पर थी ।
अब एसी बॉगी भी सामान्य हो गई है । इसमें भी तरह - तरह के लोग मिल जाते हैं ।यह बदरीनाथ की कृपा हि थी कि सभी लोग अच्छे ही मिले थे ।
गया की मोक्षदायिनी फल्गु के तटों से हरिद्वार में पतित-पाविनी गंगा की लहरों तक की यह यात्रा मात्र भौगोलिक दूरी का तय होना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चेतना का दूसरे पुण्य-प्रवाह से मिलन था । अपने चिर प्रतिक्षित सपने को साकारीकृत की मनसा पाले विष्णुपद की छाया से जब गयाजी की उस पुरातन मिट्टी को नमन कर प्रस्थान किया तो पूर्व की योजनाओं के नकारात्मक विचारों का ध्वस्तिकरण स्वतः हो गया ।पूर्वजों के आशीर्वाद और देवी - देवताओं की कृपा काम आई ,ऐसा लग रहा था ।सबके मन में एक अद्भुत गुरुता और शांति का वास था ।सबके माने ऊपर बता आए हैं - हम चार थे - डॉ राम कृष्ण भाई, डॉ शशिभूषण भाई ,डॉ सुदर्शन जी और मैं ।रामकृष्ण भाई हमसे लगभग सात वर्ष की ऊँचाई पर हैं और सुदर्शन जी लगभग दस वर्ष पीछे ।शशी भाई वही दो चार माह आगे - पीछै होंगे । आपात स्थिति में सुदर्शन बाबू की तरुणाई हम सभी की बोझ - वाहिका हो सकेगी ,यात्रा का ऐसा शुभ विचार था । इसीलिए उन्हें कषाधिकारी बनाया गया था ।वे नित के पाई - पाई का हिसाव रखते थे ।
गया की गलियों में गूँजते मंत्रों और पिंडदान की उस सात्विक गंभीरता को पीछे छोड़, रेलगाड़ी जब उत्तर-पश्चिम की ओर डेग भरने लगी तो खिड़की से बाहर बिहार के विस्तृत और हरे-भरे शस्य-श्यामला मैदान एक चलचित्र की भाँति ओझल होने लगे। जैसे-जैसे पहियों की गूँज तेज होने लगी, मार्ग में उत्तर प्रदेश के वे जनपथ आने लगे जहाँ गंगा और यमुना का वैभव अपनी छटा बिखेरता है। यही तो मगध और काशी की संस्कृतियों का संगम देखने और अनुभव करने का समय था ।काशी और अयोध्या जैसे तीर्थों की आभा मानो अदृश्य रूप से इस यात्रा को अपना आशीर्वाद देती चल रही थी । रात्रि के सन्नाटे में जब ट्रेन की सीटी गूँजती थी, तो ऐसा प्रतीत होता था मानो समय की धारा हमें कलियुग के कोलाहल से खींचकर सतयुग की पावनता की ओर ले जा रही हो।
रात्रि ने विश्राम लिया ,सुवह - सुवह हिमालय के द्वार पर आँखें खुलीं , शिवालिक की पहाड़ियाँ धुंधलके से उभरने लगीं और वायु में घुली एक विलक्षण शीतलता और पवित्रता का साक्षात्कार हुआ - यही तो हरिद्वार था । वह स्थान जहाँ पहुँचकर 'हरि' का द्वार स्वतः ही खुल जाता है।
हरिद्वार का दृश्य-काव्य मुखर हो उठता है जब ब्रह्मकुंड की आभा विखरती है । हर की पौड़ी पर संध्या के समय जब सहस्त्रों दीपकों की ज्योति गंगा की लहरों पर नृत्य करती है, तो ऐसा लगता है मानो आकाश के सारे नक्षत्र धरती पर उतर आए हों।
कल-कल निनादिनी गंगा की तीव्र और निर्मल धारा जब पत्थरों से टकराती है, तो वह ध्वनि किसी वैदिक ऋचा के गान सी प्रतीत होती है।
भक्ति का ज्वार सब पर तब चढ़ गया जब घंटों की ध्वनि, शंखनाद और 'हर-हर गंगे' के उद्घोष से संपूर्ण वातावरण गुंजायमान हो उठा । सब ने महशूस किया कि जहाँ हम 'विगत' (पूर्वजों) के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करते हैं, वहीं हरिद्वार में हम 'वर्तमान' और 'स्वयं' को उस अनंत चैतन्य में विसर्जित कर देते हैं। गया से हरिद्वार की यह साहित्यिक और आध्यात्मिक यात्रा वास्तव में 'पिंड' से 'ब्रह्मांड' की ओर एक अनंत प्रवासन है। यहाँ पहुँचकर यात्री अपनी थकान भूल जाता है और उसकी आत्मा गंगा की लहरों के समान ही निर्मल और वेगवती हो जाती है।
हरिद्वार में कई परिचित रहते हैं ।हमने उनसबों में से अपने भाई (स्व॰ ऊमेश भैया ) के घर रुकना ही श्रेयष्कर समझा ।उनका लड़का और मेरा भतीजा चुमचुम (घरेलु नाम ) हमें लेने स्टेशन पर आया ।उसके यहाँ यह मेरा पहला प्रवास था ।घर तो अच्छा बना लिया है ,फिर भी चार - चार लोगों का रहना अबुध कुटुम्बी ऐसा लग रहा था ।परंतु पूरे परिवार का भाव सेवा समर्पण सारे विचारों पर क्षण - क्षण तुषारापात कर रहा था । बचपन की स्मृतियाँ साक्षात्कार हो रहीं थीं ।देवर - भौजाई का रिस्ता मुखरित हो रहा था ।चुमचुम का स्वभाव भी अद्भुत् है ।उसके बच्चे "कान्हा और बच्ची,जो बी एड में पढ़ती है "बहुत ही सरल स्वभाव के हैं । भाभी का तो कहना ही क्या !हम तीन भाइयों में तीन चार महीने की बड़ाई - छोटाई है ।इनमें यह सबसे पहले आने वाली भाभी थी - सरल सोभाव छुअत छल नाहीं । सभी पुराने दृश्य वाइसकोप की तरह घुमने लगे ।
चुमचुम ने अपनी गाड़ी एक चालक के सथ घुमने के लिए साथ कर दिया था ।चालक बहुत कुशल नहीं था ।उसे न घाट का ज्ञान था न वाट का । कई घाटों को दिक्भ्रमित कर उसने त्रिवेणी घाट पहुँचाने में किसी तरह सफलता पाई ।यहाँ गंगा अति वेगवती हैं ।घाट पर बंधे सीकड़ के सहारे हमलोगों ने किसी तरह स्नान किया ।सिढ़ियाँ जल प्लावित थीं ,इससे उनपर फिसलन वाली काई का साम्राज्य था । मैं तो गिरते गिरते थमा । और लोगों की भी यही स्थिति थी ।
इसी चालक के सहारे हमलोग राम झूला गए ,जहाँ नाव का सहारा लेकर गंगा को उलंघित किया ।उसपार गीता भवन ,लक्ष्मी नारायण मंदिर चोटीवाला के दर्शन किए ।वहीं गीता भवन में प्रसाद पाया ।न्यौछावर के रूप में यहाँ साठ रुपए प्रति थाली देने होते हैं , सो दिया । वहाँ से गायत्री शक्तिपीठ दर्शनार्थ गए ।
अब सन्त लोग भी जँह तँह सुर बैठे करि थाना को चरितार्थ करने लगे हैं । हमलोगों के स्थानदर्शक वर्मा जी थे जिन्होने बताया कि विश्वामित्र यहीं तपस्या कर रहे थै ,जिसकी सुरक्षा के लिए भगवान राम एवं लक्ढण को घधार मांगा था ।हमलोग लाइक ए गुड बॉय सुनते रहे ।फर चुमचुम के घर नवोदय नगर आ गए । रात्रि विश्राम वहीं हुआ ।भोजन बड़ी स्वादिष्ट हुआ पर ज्यादा हो गया ।दूसरे दिन बदरीनाथ के लिए प्रस्थान करने के पूर्व चुमचुम ने प्रेम नगर घाट पर गंगा स्नान कराया । स्नात होकर हमने बालभोग प्राप्त किया और फिर प्रस्थान किया ।
हमारा सारथी बहुत पढ़ा लिखा नहीं था ,परंतु वह एक गाइड का भी काम कर रहा था ।वह अपने काम में दक्ष था ।
हमारी यात्रा सुवह साढ़े सात बजे आरंभ हुई ।हरिद्वार से ॠषिकेश तक तो सामान्य मार्ग था ।मुझे दिक्भ्रम हो गया था ,इसलिए साथ चलने वाली गंगा कभी पूरव कभी पश्चिम लग रही थी ।लेकिन लक्ष्मण झूला तक आते आते यह भ्रम मिट गया ।हम सीधा उत्तर की ओर बढ़ रहे थे ।गंगा हमारे साथ साथ चल रही
थी ।
ऋषिकेश की पवित्र सीमाओं को पीछे छोड़ते ही गंगा का स्वरूप बदलने लगा। यहाँ से देवप्रयाग तक की यात्रा केवल भूगोल की चढ़ाई नहीं, बल्कि प्रकृति का एक विराट काव्य लगा ।
गंगा का अल्हड़ यौवन ऋषिकेश के शांत विस्तार से निकलकर जब पहाड़ों के घुमावदार रास्तों पर बढ़ता हैं, तो गंगा नीचे गहरी घाटियों में अटखेलियाँ करती दिखती हैं। यहाँ नदी का रंग 'फिरोजी' और 'पन्ने' जैसा हरा दिखाई देता है। वह पत्थरों से टकराकर जो संगीत पैदा करती है, वह शास्त्रीय वाद्य यंत्र की ध्वनि जैसा प्रतीत होता है। ऊँचाई पर बढ़ते हुए चीड़ और देवदार के वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो वे आकाश को छूने की लालसा रखने वाले तपस्वी हों।सर्पिलाकार पर्वतीय मार्ग पर जैसे-जैसे चढ़ाई बढ़ती है, पहाड़ अपनी विशालता से अपनी लघुता का अहसास कराने लगते हैं। बादल अक्सर इन चोटियों को गले लगाते हुए मिलते हैं, जिससे सारा दृश्य किसी 'रहस्यवादी उपन्यास' के पन्ने जैसा लगने लगता है।व्यासी में गंगा की लहरें ऊँची और उग्र हो जाती हैं।
जो जीवन के संघर्ष और अदम्य साहस का प्रतीक प्रतीत होती हैं।
हमलोग चाय पीने के वहाने कौड़ियाला में रुके ।हवाओं का स्पर्श थोड़ी देर के लिए ऊँचाई पर एक खास किस्म की ठंडक और शुद्धता का संकेत दे गया जिसमें मिट्टी और वनस्पति की मिली-जुली सोंधी महक बसी थी ।
संगम के साक्षात्कार के लिए आँखें तरस रहीं थी।।
देव प्रयाग
चढ़ाई का चरमोत्कर्ष तब आता है जब दूर से 'देवप्रयाग' की झलक मिलती है। यह वह स्थान है जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं। यह दो पवित्र धाराओं के मिलन का साक्षी स्थल है ।सामने पहाड़ों की गोद में दो नदियाँ आपस में आलिंगन करती दिखती हैं:
अलकनंदा गंभीर, विशाल,शांत और गहरी है । इसका स्वरूप किसी 'महाकाव्य' की तरह धीर और गंभीर है।भागीरथी चंचल, वेगवती और शोर मचाती आती है । यह किसी 'मुक्तक छंद' की तरह उन्मुक्त और प्रवाहमयी है।सारथी ने बताया कि अलकनन्दा भले शान्त दिखती है परंतु वर्षात में काफी गुसैल होकर उफनती है ।इन दोनों का मिलन स्थल एक अलौकिक दृश्य है जहाँ मटमैला और नीला जल मिलकर एक नई पहचान—'गंगा'—को जन्म देता है। देवप्रयाग की यह चढ़ाई भक्तों के लिए श्रद्धा, यात्री के लिए रोमांच और कवि के लिए एक अनन्त प्रेरणा है। यहाँ पहुँचकर ऐसा लगता है मानो समय रुक गया हो और प्रकृति अपनी संपूर्ण भव्यता के साथ आपके सामने नतमस्तक हो।
देवप्रयाग से आगे की यात्रा साहसिक, सांस्कृतिक और भाषाई गहराई की यात्रा थी । जहाँ अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है, वहीं से न केवल गंगा का नाम शुरू होता है, बल्कि यहाँ से हिमालयी लोक-संस्कृति की एक नई धारा भी प्रस्फुटित होती है।
यहाँ दो मकान एक साथ बने नहीं दिखे । दो घरों में मुकुट और पादुका का संबंध दिखा । यहीं पहाड़ पर राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय बसा हुआ है ।रास्ते संकरे हैं ।कहीं- कहीं तो एक गाड़ी भी पार करना मुश्किल लगता है ।
मैं ने रास्ते के वारे में पूछा तो उसने बताया -
नदियाँ अपना रास्ता सबसे कम दूरी वाली चुनती हैं ।इसीलिए सड़कें भी सबसे कम दूरी को ध्यान में रखकर नदियों के साथ साथ बनाई जाती हैं ।
ऊँचे पर्वतों पर ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है ,इसलिए पेड़ नहीं होते ।और पेड़ नहीं होते तो ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है ।
. श्रीनगर (गढ़वाल)
देवप्रयाग से लगभग 35 किमी आगे बढ़ने पर श्रीनगर आता है जो उत्तराखंड चार धाम यात्रा' (बद्रीनाथ और केदारनाथ) के मुख्य पड़ाव के रूप में जाना जाता है। यह हिमालय की गोद में बसा है ।अलकनंदा नदी के तट पर बसे होने के कारण इसका दृश्य अत्यंत मनोरम लगता है। यहाँ से हिमालय का सुंदर नजारा दिखता है ।यह अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक महत्व के लिए विश्व प्रसिद्ध है । यहाँ हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय स्थित है। यहाँ राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान(NITउत्तराखंड और राजकीय मेडिकल कॉलेज भी हैं । यह ट्रेकिंग एवं रिवर राफ्टिंग के शौकीनों के लिए एक शुरुआती बिंदु है।
यह स्थान गढ़वाल की ऐतिहासिक राजधानी और शिक्षा का बड़ा केंद्र रहा है। यहाँ के वातावरण में सुमित्रानंदन पंत की प्रकृति-चेतना का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। गढ़वाली साहित्य के पुरोधाओं ने इसी धरती से अपनी लेखनी को धार दी है।
हमारे सारथी ने बताया कि श्रीनगर पुराने समय में गढ़वाल साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। अजय पाल ने 14वीं शताब्दी के आसपास इसे अपनी राजधानी बनाया था। यह शहर गढ़वाल के राजाओं के वैभव और गौरवशाली इतिहास का साक्षी रहा है।
यहाँ कई प्राचीन मंदिर हैं: ; जैसे - कमलेश्वर महादेव मंदिर: माना जाता है कि यहाँ भगवान राम ने शिव की तपस्या की थी। वैकुंठ चतुर्दशी के अवसर पर यहाँ विशेष मेला लगता है।
धारी देवी मंदिर: श्रीनगर के पास स्थित यह मंदिर गढ़वाल की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है।
हमारे सारथी ने बताया कि कुछ दिन पूर्व केगार नाथ में घटी अप्रत्याशित घटना के पीछे इन्ही धारी देवी का कोप था ।सरकार इन्हें यहाँ से हटाकर ऊपर लाना चाहती थी ,लेकिन कोप के कारण ऐसाा नहीं हो सका ।
हमलोग वहाँ नहीं जा सके ,दूर से प्रणाम निवेदित ,समर्पित करना पड़ा ।कारण कुछ नहीं था ।जाते समय विचार हुआ कि लौटते समय दर्शन करेंगे और लौटते समय उतना उतरना और फिर चढ़ना संभव नहीं हो
सका ।
शंकर मठ: शंकर मठ एक अत्यंत प्राचीन और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण स्थल है। यह मठ अपनी ऐतिहासिकता और अद्वितीय स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है।
इस मठ की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने अपनी भारत यात्रा के दौरान की थी। श्रीनगर (उत्तराखंड) प्राचीन काल से ही गढ़वाल की राजधानी और शिक्षा का केंद्र रहा है, और यह मठ उस काल की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है।
यह मठ पत्थरों को तराश कर बनाई गई कत्यूरी शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी बनावट और पत्थरों पर की गई नक्काशी दर्शकों को प्राचीन भारतीय शिल्प कला की याद दिलाती है। यह मंदिर सदियों से आने वाली प्राकृतिक आपदाओं (जैसे अलकनंदा की बाढ़) के बावजूद आज भी अपने मूल स्वरूप में खड़ा है।
हमारी गाड़ी लगातार ऊपर चढ़ रही थी ।ऐसी घाटी, कि कल्पना नहीं की जा सकती । हमारा सारथी धैर्यवान था और अपने सारथी कर्म और धर्म में कुशल भी । वह स्थान का महत्व समझाता जाता और रास्ता भी काटता जाता । श्रीनगर से आगे बढ़ने पर अलकनंदा और मंदाकिनी के संगम पर स्थित रुद्रप्रयाग आया ।यहाँ का कोना-कोना उन रोमांचक कहानियों की याद दिलाता है। साहित्यिक विषयक संदर्भित बार्ता आरंभ हुई ।यहाँ आकर श्रीराम शर्मा की पुस्तक "शिकार" को याद किए बिना कैसे बढ़ा जा सकता था ।हमलोग भिलंगना नदी खोज रहे थे ।वह तो मिलने से रही परंतु सारथि ने बताया कि यह स्थान जिम कॉर्बेट की प्रसिद्ध पुस्तक 'द मैन-ईटर ऑफ रुद्रप्रयाग' का केंद्र है जिसमें शिकार-साहित्य या यात्रा-वृत्तांतों से संबंधित कई रुचिकर कहानियाँ हैं । यहाँ भगवान शिव से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जो लोक-साहित्य का मुख्य आधार हैं।
यहीं से केदारनाथ और बदरी नाथ के रास्ते अलग होते हैं ।केदारनाथ यहाँ से 90-95 कि मी ऊपर है जबकि बदरीनात की चढ़ाई 208 कि मी है ।
. कर्णप्रयाग
रुद्रप्रयाग से आगे अलकनंदा के साथ चलते हुए हमलोग कर्णप्रयाग पहुँचें।यहाँ अलकनन्दा और पिण्डारी नदी का संगम है ।कहा जाता है कि यहाँ कर्ण ने सूर्य की तपस्या की थी। यहाँ की पहाड़ियों में पहाड़ी बोलियों के स्वर धीरे-धीरे बदले लगते हैं। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली और स्थानीय मुहावरों का संगम यहाँ की बातचीत में स्पष्ट झलकता है।
नन्द प्रयाग
अलकनन्दा सभी प्रयागों के साथ चलती है ।यहाँ पर मंदाकिनी अलकनन्दा से मिलती है ।यहाँ दोनो का संगम होता है ।अलकनन्दा बदरी धाम से आती है और मंदाकिनी केदार धाम से ।दोनो मिलकर देव प्रयाग की ओर जाती है ।
विष्णु प्रयाग
यह स्थल धौली गंगा और अलकनन्दा के संगम का साक्षी है ।पर्वतों की घाटी में दोनो दो ओर से आकर मिलती हैं और फिर मिलकर नीचे उतरती है ।
यहाँ से बदरीनाथ की खतरनाक चढ़ाई मार्ग आरंभ होता है ।
एलन
जोशीमठ के पहले एलन आता है ।हमलोग इसी एलन के होटल एक्सप्लोरिंग हिमालयाज में रुके थे ।इस होटल का स्वागत अच्छा था ,कमरे अच्छे थे ,परंतु खाना विल्कुल अच्छा नहीं लगा ।रात्रि में उसने रोटी ,दाल थोड़ा चावल ,मिक्स शब्जी खिलाया ।हमलोगों ने उससे पहले ही कह दिया था कि सामान्य भोजन बिना लहसुन - प्याज का चाहिए ,उसने दिया भी ,लेकिन दुवारा दाल लहसुन वाली दे दी ।भोजन के अपमान को ध्यान में रखकर खा तो लिया परंतु उसका प्रायश्चित करना पड़ा । दूसरे दिन पाँच बजे शाम तक पानी के शिवा कुछ नहीं लिया ।इसकी शिकायत संजीव से की तो उसने इसे डाँटा होगा ,फिर तो कुछ कहना ही नहीं ।दूसरे दिन का भोजन अच्छा था ।रात में सोडा भी पिलाया था ।
हमारे सारथी ने बताया, "यहाँ से गोविन्द घाट जाया जाता है जो उरगम घाटी में है ।यहाँ से हेमकुंड साहिब की खतरनाक यात्रा आरंभ होती है ।वहाँ के लिए अलग से रजिेस्ट्रेशन कराना पड़ता है ।हेमकुंड साहिव के रास्ते मैं फूलों की घाटी मिलती है जिसका दृश्य अति ही मनोरम है ।वहीं से पंच केदार जाया जाता है ।सबसे नजदीक कल्पेश्वर मंदिर था जो पैंतीस किलो मीटर दूर था ।वहाँ हमारी गाड़ी और हमारे सारथी की गति नहीं थी ।वहाँ बोलेरो से जाया जाता है ।हमलोग काफी थक गए थे ,इसलिए दूरदर्शन ही संभव हो सका "
जोशीमठ
वहाँ से आगे चढ़ाई पर जोशीमठ आता है ।यह बड़ा बाजारनुमा स्थान है ।यहाँ नरसिंह मंदिर है । हरिशयनी एकादशी को बदरीनाथ भगवान का पट बन्द हो जाता है और भगवान को यहीं नरसिंह मंदिर में डोला ले आया जाता है ।उन दिनों पूरा पहाड़ वर्फ से ढंक जाता है । भगवान की दैनिक पूजा यहीं पर होती है ।वैसाख तृतीया को जब पट खुलता हे तब भगवान फिर बदरीधाम के अपने मंदिर में चले जाते हैं ।इसलिए यह जगह महत्वपूर्ण है ।हमलोगों ने आराम से भगवान नरसीह के दर्शन किए ।
आगे विल्कुल खड़ी चढ़ाई थी । हमलोग आपस में बात करते उसे पूरा कर बदरी धाम पहुँच गए ।
सुनते थे कि भगवान घमंड तोड़ते हैं ,वही हुआ ।पहले से ही उतराखंड के चिकित्सा पदाधिकारी हमारे नेटवर्क में थे ।उन्होने कहा था कि उतराखंड में कहीं भी मेडिकल असिस्ट की आवश्यकता होगी ,वहीं पर मैं उपस्थित हो जाऊँगा ।्
मेरे साथ चल रहे सुदर्सन बाबू के परिचित वहीं के एक मठ के महन्त जी थे - हयग्रीवाचार्य़ जी ।उन्होने विशेष पूजा कराने का वादा किया था ।जहानाबाद के हमारे मित्र द्विवेदी,राज शेखर जी ने एक पंडा जी के माध्यम से डाइरेक्ट दर्शन की व्यवस्था की थी ।एक दिन पूर्व हमारे मित्र दीपक बनर्जी ने एक दूसरे पंदा जी का नम्बर दिया था ।सभी दाइरेक्ट पूजा करानेवाले थे ।लेकिन कोई काम नहीं आए ।अंत में नम्बर लगा कर दर्शन किए ।इसमें भी थोड़ी हेराफेरी हुई जो ऊनकी ही कृपा थी ।डॉक्टर की आवश्यकता हो गई थी ।शशिभूषण भाई का ऑक्सीजन लेवल 72 तक पहुँच गया था ,परंतु उसकी पुर्ति रास्ते में पड़नेवाले सहायता केंद्रों से हुई। बस एक सहायता - जय हो बदरी नारायण भगवान की ।
एक पंडा जी के निर्देश पर हम लोग पहले माणा गाँव चले कए । 'माणा' गाँव यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक पड़ाव है जो बदरीनाथ से साढ़े तीन किमी आगे यानी ऊपर है।
माणा गाँव समुद्र तल से लगभग 3,319 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। सामान्य दिनों में मौसम बड़ा बेबफा रहता है ।थोड़ी देर में तेज धूप थोड़ी देर में वर्षा और फिर हाड़ कँपानेवाली ठंढक ।परंतु हवा में विनम्रता घुली होती है ।लेकिन कब कँपकपा दे कुछ भी विश्वास नही। सर्दियों में यह अत्यधिक ठंड और भारी बर्फबारी की चपेट में रहता है। उस समय यहाँ का तापमान \bm{-15°C} से \bm{-20°C} तक गिर जाता है और जीवन पूरी तरह बदल जाता है।
माणा के निवासी (मुख्यतः भोटिया जनजाति) इस कठिन समय का सामना करने के लिए सदियों पुरानी परंपराओं और रणनीतियों का पालन करते हैं:
शीतकालीन प्रवास की जीवनशैली 'ऋतु प्रवास' (Transhumance) पर आधारित है। जब भारी बर्फबारी के कारण गाँव का संपर्क कट जाता है और खेती या दैनिक कामकाज करना असंभव हो जाता है। तो ,यानी अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में, जब बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद हो जाता हैं, तो माणा के लगभग सभी परिवार अपने पशुओं और आवश्यक सामान के साथ निचले इलाकों (जैसे चमोली, जोशीमठ या छिनका) में अपने दूसरे घरों की ओर चले जाते हैं।
उनके घरों की बनावट तापीय प्रबंधन के अनुकूल विशेष होती है ।इनके पारंपरिक घर पत्थरों की मोटी दीवारों और लकड़ी के शहतीरों से बने होते हैं, जो बाहर की ठंड को अंदर आने से रोकते हैं। घरों के भीतर लकड़ी जलाने के लिए विशेष स्थान या लोहे की 'बुखारी' होती है, जो पूरे कमरे को गर्म रखती है।
सर्दियों के लिए भोजन का भंडारण महीनों पहले शुरू हो जाता है।ताजा सब्जियां मिलना बंद हो जाती हैं, इसलिए लोग सूखी सब्जियाँ जैसे सुखाया हुआ साग एवं अन्य शब्जियाँ , दालें और अनाज जमा कर लेते हैं।शरीर को गर्म रखने के लिए स्थानीय जड़ी-बूटियों से बनी चाय और ऊर्जायुक्त पेय पदार्थों का सेवन किया जाता है। शरीर का तापमान बने रहने के लिए पारंपरिक भोजन में घी और नमक की मात्रा अधिक रखी जाती है ।
सर्दियों के खाली समय का उपयोग गाँव के लोग हुनर निखारने में करते हैं। ये लोग ऊन कातने और बुनने में माहिर होते हैं। प्रवास के दौरान वे कालीन (दन्म), पंखी, मफलर और ऊनी शॉल तैयार करते हैं, जिन्हें बाद में बाजारों में बेचा जाता है। उस संक्रांति काल में पशुओं (विशेषकर भेड़ों और बकरियों) को भी निचले इलाकों में ले जाया जाता है। इन पशुओं का ऊन ही उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत होता है।
माणा के लोग प्रकृति से लड़ने के बजाय उसके साथ तालमेल बिठाकर रहते हैं। सर्दियों के दौरान 'भारत का अंतिम गाँव' लगभग खाली और बर्फ की सफेद चादर से ढका रहता है और जैसे ही अप्रैल-मई में बर्फ पिघलती है, रौनक फिर से लौट आती है।
यह भारत का अंतिम गाँव है परंतु कुछ दिन पूर्व यहाँ हमारे यशस्वी प्रधान मंत्री देव पुरुष नरेन्द्र भाई मोदी आए थे तो उन्होने इसे भारत के पहले गाँव के रूप में संबोधित किया था ,तब से यह पहला गाँव हो गया ।यहाँ का यानि माणा गाँव में "बदरी चाय" बहुत प्रसिद्ध है।
यहाँ के लोग स्थानीय पहाड़ों से चुनी गई कुछ विशेष फूलों और वनस्पतियों का उपयोग करके इसे तैयार करते हैं । इसे बनाने के लिए मुख्य रूप से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मिलने वाली जंगली तुलसी, गंधरायण और वन ककड़ी जैसी औषधीय वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता है।
कभी-कभी इसमें स्थानीय दुर्लभ फूलों की पंखुड़ियों के अंश जैसे ब्रह्मकमल और अन्य फूल:भी मिलाए जाते हैं जो इसे एक विशिष्ट सुगंध और रंग देते हैं।
यह चाय केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि ठंड से बचने, थकान मिटाने और पाचन तंत्र को ठीक रखने के लिए भी पी जाती है।
अपने प्रधान मंत्री जब वहाँ गए थे ,तो उन्होने माणावासियों के द्वारा निर्मित कुछ सामान खरीदने का आग्रह किया था ।उनकी बात मानकर हमलोगों ने राष्ट्रवादी होने परिचय दिया ।सभी ने टोपी , मफलर और ऊृनी चादरें खरीदीं ।बाजर में बाजारवाद दिखा ,।मोल - भाव करके वहाँ के बाजार को गुलजार रखा ।
माणा गाँव के प्रवेश द्वार पर और गाँव के अंदर स्थित छोटी 'भारत की अंतिम या पहली चाय की दुकानों पर पर्यटक अक्सर इस ताजी और प्राकृतिक चाय का आनंद लेते हैं।
व्यास गुफा
इस माणा गाँव से ही गंधमादन पर्वत की शुरुआत होती है ।इसी गंधमादन पर्वत पर हनुमान जी का निवास है ।इसके ऊपर चढ़ाई पर व्यास गुफा आता है ।
माना जाता है कि इसी गुफा में महर्षि वेदव्यास ने महाभारत और पुराणों की रचना की थी। यह विश्व के सबसे प्राचीन और महानतम 'साहित्यिक कार्यस्थल' के रूप में देखा जाता है।
यहाँ से कुछ नीचे गणेश गुफा है जहाँ बैठकर गणेश जी ने महाभारत की रचना की थी ।व्यासगुफा से गणेश गुफा थोड़ा दूर या ऊपर - नीचे है ,लेकिन मान्यता यही है कि व्यास जी ऊपर से बोलते थे और गणेश जी नीचे सुन कर लिखते थे ।
सामान्य दिनों में मौसम बड़ा बेबफा रहता है ।थोड़ी देर में तेज धूप थोड़ी देर में वर्षा और फिर हाड़ कँपानेवाली ठंढक ।परंतु हवा में विनम्रता घुली होती है ।लेकिन कब कँपकपा दे कुछ भी विश्वासी नही।
अपने प्रधान मंत्री जब वहाँ गए थे ,तो उन्होने माणावासियों के द्वारा निर्मित कुछ सामान खरीदने का आवाह्न किया था ।उनकी बात मानकर हमलोगों ने राष्ट्रवादी होने परिचय दिया ।सभी ने टोपी , मफलर और ऊृनी चादरें खरीदीं ।बाजर में बाजारवाद दिखा ।मोल - भाव करके वहाँ के बाजार को गुलजार रखा ।
यहीं से सरस्वती नदी निकलती है जिसके दर्शन हुए । इस उद्गम स्थल को देखकर सारा थकान दूर हो गया एवं जीवन सार्थक हो गया ।। ऋग्वेद की ऋचाओं में जिस नदी का सबसे अधिक वर्णन है, उसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार हमारी यात्रा को पूर्णता दे रहा था ।इस स्थान पर यह सरस्वती नदी बहुत तेज धारा के साथ बहुत आबाज के साथ निकलती दिखाई देती है ।लगभग तीन सौ मीटर तक इसका प्रसार भी दृश्य है ,परंतु अचानक कहाँ लुप्त हो जाती है ।अचानक किस सन्नाटे में गर्जना करती तेज धारा ,तेज आबाज के साथ कहाँ गूम हो गई , पता नहीं चलता ?
यहाँ से थोड़ा ,थोड़ा माने करीब एक सौ मीटर नीचे भीम पुल है ।कहा जाता है -"सरस्वती नदी कुन्ती आदि को ऊधर जाने में बाधा डाल रही थी ,इसलिए भीम ने एक बड़ा सा पत्थर वहाँ पर रख दिया था जो आज पुल का काम कर रहा है ।उससे नीचे उतरने पर स्वर्ग का रास्ता मिलता है जहाँ से पाण्डवो ने स्वर्गारोहण किया था । लगभग पाँच सौ मीटर उतरना और फिर चढ़ना हमारी पाटीं के लिए आसान नहीं था ,इसलिए उसका भी हमने दूरदर्शन ही किए ।
यहाँ आकर महादेवी वर्मा की यात्रा वाली "सूई दो रानी ,डोरा दो रानी" के दर्शन नहीं हुए।
हाँ ! स्थानीय गढ़वाली और हिंदी के मिश्रित शब्दों से कभी कभी सारथी के कारण परिचित हो जाता था ।जैसे 'दगड़्या' - साथी ,बुआ -पिता,इजा - माता,कवाड़ - लड़का ,कुवैड़ - लड़की , खौणु - खाना ,हिटणु - चलना ,सोवाणु - सुन्दर को समझने का प्रयास किया ।जिस हॉटल में हम ठहरे थे ,इसमें हमारा सारथी बात कर रहा था - कख जाणा छौ ?
इसने जबाब दिया - बद्री ।
तुमणों रोटी खै ली ?,
ह्वै हमणी रोटी खै ली ।
भोल कलेवा ------ आगे,नहीं समझे ।
उस समय राहुल सांकृत्यायन के 'हिमालय परिचय' - "यह मार्ग केवल पत्थरों और नदियों का नहीं, बल्कि शब्दों और संवेदनाओं का एक जीवंत ग्रंथ है" याद आया। वह पुस्तक इस यात्रा में सबसे अच्छा साथी साबित हों सकती थी ।
शाम में करीब पाँच बजे से हमलोग नीचे उतरने लगे । इन पहाड़ों पर भूस्खलन बहुत होता है ।पहाड़ टूटते हैं और रास्ते बन्द हो जाते हैं ।पूर्व ज्ञान यही था कि पहाड़ कैसे टुटेंगे ।लेकिन नजदीक देखने का सौभाज्ञ भी प्राप्त हुआ ।यहाँ पहाड़ बहुत पुराने हैं ,इसलिए मिट्टी का अंश उसमें अधिक है । मार्ग पर पसरे अवरोधक को देखकर यही लगा कि पत्थर खंडों के साथ मिट्टी पसरी हुई है । रास्ते में हनुमान चट्टी मिला ।दूरदर्शन कर नीचे उतरते रहे ।रात में फिर अपने हॉटल में आश्रय लिया ।दूसरे दिन पोहे का नास्ता करके हमलोगों ने हरिदौार तक की सफर तय की । फिर वहीं रुके ।भाभी जी चावल,दाल ,शब्जी ,बजका - बजकी बनाकर इंतजार कर रहीं थी । खाना हुआ ,सोना हुआ और सुवह में रिषिकेश के लिए रवाणा हुए ।
रिषिकेश मैं सुदर्शन बाबू की साली का मठ है ।वही महंत जी यहाँ भी महंत हैं ।वे अभी आए हुए थे ।यहाँ भी अच्छा स्वागत हुआ ।दूसरे दिन मसूरी जाना था ।मौसम बहुत ही खराब हो गया ।हमलोग कहीं नहीं जा सके ।आराम किया ।5 मई को सुवह साढ़े चार बजे निकले ।हरिद्वार स्टेशन से गाड़ी थी ,दिल्ली आए,वहाँ से हावड़ा - राजधानी से गया आ गए ।
यहाँ शक्ति जी समने तैयार थे ।सबको घर पहुँचा दिए ।
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