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तुम प्रणय की रजनीगंधा हो

नारी केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान और असीम हौसलों की प्रतिमूर्ति है। समाज के हर कटाक्ष को सहकर भी वह राष्ट्र और परिवार के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाती है।
मेरी स्वरचित नई रचना _
"तुम प्रणय की रजनीगंधा हो"
आधुनिक नारी की इसी अदम्य साहस और गरिमा को समर्पित है।

तुम प्रणय की रजनीगंधा हो

कुमार महेंद्र
मस्त मलंग से हाव-भाव,
तन-मन अति सुघड़ सुडौल।
अल्हड़ चितवन, सहज व्यवहार,
मधुर मृदुल अनुरागी बोल।
अधुनातन परिधान-शैली,
चारु चपल सी चंद्रा हो।
तुम प्रणय की रजनीगंधा हो।।


अंग-प्रत्यंग चहक-महकते,
नव यौवन का दिव्य उभार।
आचार-विचार मर्यादित,
अंतस आलोकित संस्कार।
ज्ञान-ध्यान निज सामर्थ्य सहित,
अद्भुत हौसलों की प्रचंडा हो।
तुम प्रणय की रजनीगंधा हो।।


चाह प्रगति के हर क्षेत्र में,
टूटें जड़ सोचों के लेख।
ललक-झलक उत्कर्ष-पथ की,
प्रेरित करती मीन-मेख।
त्याग अंधविश्वास-कुरीतियाँ,
उर-भावों की पूज्य वृंदा हो।
तुम प्रणय की रजनीगंधा हो।।


सहती समाज के व्यंग्य-बाण,
लैंगिक कटाक्षों का वहन।
पग-पग पहरा शील-चरित्र पर,
स्वाधीनता का का गहन मनन।
अहम भूमिका परिवार-राष्ट्र में,
निर्मल पुनीत सुर-गंगा हो।
तुम प्रणय की रजनीगंधा हो।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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