द्वादश आदित्य और : ब्रह्मांड
सत्येन्द्र कुमार पाठक
सनातन धर्म के वेदों, पुराणों और स्मृति ग्रंथों में भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है। वे न केवल प्रकाश के स्रोत हैं, बल्कि ब्रह्मांड की आत्मा और काल चक्र के संचालक भी हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र ऋषि मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप और राजा दक्ष की पुत्री माता अदिति के संयोग से बारह पुत्रों का जन्म हुआ, जिन्हें 'द्वादश आदित्य' कहा जाता है। ये बारह आदित्य वास्तव में भगवान सूर्य के ही विभिन्न रूप हैं, जो सृष्टि में संतुलन बनाए रखने के लिए वर्ष के 12 अलग-अलग महीनों में अपनी विशिष्ट ऊर्जा का संचार करते हैं।
प्रत्येक मास में एक विशेष आदित्य सौरमंडल के अधिष्ठाता बनते हैं। उनके कार्य, प्रभाव और संबंधित महीनों का विस्तृत विवरण इस प्रकार है: 1 धाता का चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) जीव-जंतुओं की रचना, उनका पालन-पोषण और सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करना। 2 अर्यमन का वैशाख मास (अप्रैल-मई) वायु का स्वरूप। इन्हें देवों और पितरों का नेता माना जाता है, जो न्याय और वंश वृद्धि के प्रतीक हैं।।3 मित्र का ज्येष्ठ मास (मई-जून) चंद्रमा और समुद्र के स्वामी। ये संसार में मित्रता, सहयोग, शांति और सौहार्द की भावना जगाते हैं। 4 वरुण का आषाढ़ मास (जून-जुलाई) जल और वर्षा के देवता। ये लौकिक और नैतिक व्यवस्था (ऋत) के रक्षक हैं। 5 इंद्र का श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) देवराज का स्वरूप। ये असुरों के संहारक, बादलों के अधिपति और प्रचुर वर्षा के कारक हैं। 6 विवस्वान का भाद्रपद मास (अगस्त-सितंबर) अग्नि का स्वरूप और प्रखर तेज। ये कृषि को पकाने और अशुद्धियों को नष्ट करने वाली ऊर्जा हैं।।7 त्वष्टा का आश्विन मास (सितंबर-अक्टूबर) सृष्टि के शिल्पी (विश्वकर्मा स्वरूप)। ये वृक्षों, औषधियों और वनस्पतियों में तेज का संचार करते हैं। 8 विष्णु का कार्तिक मास (अक्टूबर-नवंबर) वामन अवतार के रूप में प्रतिष्ठित। ये बुराई का नाश करते हैं और संपूर्ण जगत का संरक्षण करते हैं। 9 अंशुमान का मार्गशीर्ष मास (नवंबर-दिसंबर) सूर्य की कोमल और प्राणदायी किरणों के देवता, जो शीत ऋतु में जीवन को गति देते हैं। 10 भग का पौष मास (दिसंबर-जनवरी) ऐश्वर्य, सौभाग्य, धन-धान्य और सभी जीवों के शरीर में अंतर्निहित ऊर्जा के स्वामी। 11 पूषा का माघ मास (जनवरी-फरवरी) वनस्पतियों, अन्नों और पोषण के देवता। ये फसलों को पुष्ट करते हैं और मार्ग की रक्षा करते हैं। 12 पर्जन्य का फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) पुनः वर्षा की अनुकूलता बनाने वाले और ऋतु चक्र (बसंत के आगमन) को गति देने वाले देवता है।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, ये सभी द्वादश आदित्य वास्तव में भगवान श्री हरि विष्णु के ही तेज और विस्तार हैं। सूर्य देव अपने सात घोड़ों वाले दिव्य रथ पर सवार होकर आकाश मार्ग से बारह राशियों (मेष से मीन तक) में भ्रमण करते हैं। जैसे ही सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं (जिसे संक्रांति कहा जाता है), वैसे ही उस मास के अधिष्ठाता आदित्य का प्रभाव धरती पर सक्रिय हो जाता है। प्रत्येक मास में केवल एक आदित्य ही अकेले यात्रा नहीं करते। उनके रथ पर उनके साथ एक विशेष ऋषि (जो वेदमंत्रों से स्तुति करते हैं), एक अप्सरा (जो नृत्य करती हैं), एक गंधर्व (जो गायन करते हैं), एक यक्ष, एक राक्षस और एक नाग की पूरी टोली (मंडली) निवास करती है। यह सात प्रकार की शक्तियों का समूह मिलकर उस महीने की जलवायु और पर्यावरण को नियंत्रित करता है।
द्वादश आदित्य की यह व्यवस्था केवल धार्मिक कथा मात्र नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और पारिस्थितिक महत्व है: ऋतु चक्र का संचालन: इन 12 रूपों के कारण ही धरती पर सर्दी, गर्मी और बरसात का चक्र नियमित रूप से चलता है। फसलों का पकना, जल का वाष्पीकरण (Evaporation) होना और औषधियों में रस का भरना इन्हीं की रश्मियों (किरणों) के कारण संभव है। भगवान सूर्य देव को 'आरोग्यं भास्करादिच्छेत्' कहा गया है। इनके विभिन्न रूपों की उपासना से शारीरिक व्याधियां दूर होती हैं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि पृथ्वी पर जीवन फलता-फूलता रहे और सौरमंडल में एक निश्चित लय (Harmony) बनी रहे ।।द्वादश आदित्य के रूप में भगवान सूर्य का यह विवरण हमें सिखाता है कि सृष्टि का कण-कण एक सुव्यवस्थित नियम से बंधा हुआ है। चैत्र से लेकर फाल्गुन तक, सूर्य की बदलती ऊर्जा हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की प्रेरणा देती है।
सौर संस्कृति (Solar Cult) की स्थापना - सनातन परंपरा और वैदिक इतिहास के अनुसार, सौर संस्कृति की स्थापना किसी एक राजा ने नहीं की, बल्कि यह मनुष्यों के प्रादुर्भाव के साथ ही शुरू हुई। इसके मूल स्तंभ निम्नलिखित हैं: आदि प्रवर्तक (विवस्वान और मनु): पुराणों के अनुसार, भगवान कश्यप और अदिति के पुत्र विवस्वान (सूर्य देव) ने सबसे पहले यह ज्ञान अपने पुत्र वैवस्वत मनु को दिया। गीता में भी भगवान कृष्ण कहते हैं कि उन्होंने यह अविनाशी योग सबसे पहले विवस्वान को ही सुनाया था। वैवस्वत मनु ने ही इस धरती पर मानव सभ्यता और सौर संस्कृति (नियम-आधारित जीवन) की नींव रखी। भविष्य पुराण और साम्ब पुराण के अनुसार, द्वापर युग में भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था। तब नारद जी के परामर्श पर साम्ब ने चंद्रभागा (चिनाब) नदी के तट पर सूर्य देव की घोर तपस्या की। सूर्य देव की पूजा के लिए उन्होंने 'शाकद्वीप' (आधुनिक ईरान/मध्य एशिया के क्षेत्र) से 'मग' (Maga) ब्राह्मणों को भारत बुलाया, जिन्हें 'मगज' या 'शाकद्वीपीय ब्राह्मण' कहा जाता है। इन्होंने ही भारत में मूर्ति रूप में सूर्य पूजा और भव्य सूर्य मंदिरों के निर्माण की पद्धति (सौर संस्कृति) को देश-विदेश में फैलाया।
भारत में प्रमुख आदित्य और उनके उपासना स्थल:।मित्र और वरुण आदित्य (लौकिक व्यवस्था और जल): इनका मुख्य केंद्र भारत का समुद्र तटीय और नदीय क्षेत्र रहा। उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर (अर्का क्षेत्र) और गुजरात का मोढेरा सूर्य मंदिर इसके महान प्रतीक हैं।।धाता और विवस्वान आदित्य (सृष्टि की रचना और तेज): कश्मीर का मार्तंड सूर्य मंदिर (अनंतनाग)। 'मार्तंड' शब्द विवस्वान का ही रूप है। कश्मीर का नाम ही महर्षि कश्यप (कश्यप-मेरु) पर है, जो आदित्यों के पिता हैं। इंद्र और विष्णु आदित्य (श्रावण और कार्तिक मास): बिहार का देव सूर्य मंदिर (औरंगाबाद) और बड़गांव सूर्य मंदिर (नालंदा), जहां आज भी देश का सबसे बड़ा सौर पर्व 'छठ महाव्रत' मनाया जाता है।
सौर पीठ: मुल्तान (अब पाकिस्तान में, प्राचीन नाम: कश्यपपुर/साम्बपुर) - यहाँ का 'आदित्य मंदिर' कभी पूरे एशिया में सौर संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र था। उन्नाव का सूर्य मंदिर (मध्य प्रदेश) और बेलाउर सूर्य मंदिर बिहार है। वैदिक काल के आदित्य ही विश्व की अन्य सभ्यताओं में वहां के मुख्य देवता बने, क्योंकि प्रागैतिहासिक काल में भारत की सौर संस्कृति का विस्तार पूरी दुनिया में था: मिस्र (Egypt) - 'रा' (Ra) और 'आतेन' (Aten) का साम्राज्य: मिस्र में सूर्य को 'रा' कहा जाता था। वहाँ के राजा खुद को सूर्य-पुत्र मानते थे। 'आतेन' (Aten) शब्द भारतीय शब्द 'आदित्य' का ही अपभ्रंश माना जाता है। काहिरा के पास अबू गोराब में प्राचीन 'सन टेम्पल्स' (Sun Temples) इसके प्रमाण हैं। मेसोपोटामिया और बेबीलोन - 'शमाश' (Shamash): यहाँ सूर्य देव को 'शमाश' कहा गया, जो हूबहू आदित्य के 'भग' और 'वरुण' रूप की तरह न्याय और कानून के देवता थे। यूनान और रोम - 'अपोलो' (Apollo) और 'सोल इनविक्टस' (Sol Invictus): रोम के सम्राट 'सोल इनविक्टस' (अजेय सूर्य) की पूजा करते थे। यूनान के 'अपोलो' सात घोड़ों के रथ पर चलते हैं, जो सीधे तौर पर वैदिक सूर्य के रथ का प्रतिरूप है। दक्षिण अमेरिका (Inca/Aztec सभ्यता) - 'इन्ती' (Inti): पेरू और मैक्सिको की इंका सभ्यता में सूर्य भगवान 'इन्ती' (Inti) के भव्य मंदिर (कुस्को का कोरीकांचा मंदिर) हैं। वे खुद को सूर्य की संतान मानते थे।
जापान - 'अमातेरासु' : जापान के राजपरिवार की कुलदेवी सूर्य हैं। जापान के ध्वज पर आज भी उगते सूर्य का प्रतीक है, जिसे 'सूर्योदय का देश' कहा जाता है।
भगवान सूर्य (विवस्वान) के नाम से ही पृथ्वी पर 'सूर्यवंश' या 'इक्ष्वाकु वंश' की स्थापना हुई। इसके वंशज आज भी भारत के इतिहास और वर्तमान में मौजूद हैं: विवस्वान आदित्य के पुत्र वैवस्वत मनु के पिता इक्ष्वाकु (सूर्यवंश के संस्थापक) और पुत्री इला (चंद्रवंश की जननी) थी । राजा इक्ष्वाकु ने अयोध्या को राजधानी बनाया। इसी वंश में आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता, सत्यवादी हरिश्चंद्र, सागर, भगीरथ (जो गंगा को धरती पर लाए), राजा रघु (जिनके नाम पर यह वंश 'रघुकुल' कहलाया), राजा दशरथ और स्वयं भगवान श्री रामचंद्र जी अवतरित हुए। जैन और बौद्ध धर्म में संबंध: जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी और २२ तीर्थंकर इसी इक्ष्वाकु (सूर्यवंश) से थे। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, महात्मा बुद्ध (शाक्य सिंह) भी इसी सूर्यवंश के कुल में जन्मे थे।।आधुनिक युग में वंशज: आज भारत के राजपूत कुलों में जो 'सूर्यवंशी राजपूत' हैं (जैसे राजस्थान के उदयपुर का सिसोदिया राजवंश, कछवाहा राजवंश, राठौड़, मिन्हास और रघुवंशी आदि), वे स्वयं को भगवान राम के पुत्रों (लव और कुश) का वंशज और उसी आदि-सूर्यवंश की शाखा मानते है । धाता और अर्यमन उत्तरी क्षेत्र (हिमालय, कश्मीर, कुरुक्षेत्र) पितृ तर्पण, वंश वृद्धि और समाज सुधार , मित्र और वरुण तटीय क्षेत्र (उड़ीसा, गुजरात, सुदूर पूर्व) समुद्री व्यापार, वर्षा और वैश्विक शांति , इंद्र और विवस्वान मध्य भारत (बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश) छठ पर्व, कृषि उत्सव और प्रखर तेज की उपासना विष्णु और त्वष्टा संपूर्ण ब्रह्मांड (शिल्प और संरक्षण) देवोत्थान एकादशी, विश्वकर्मा पूजा और ऋतु परिवर्तन।सनातन धर्म की यह सौर संस्कृति आज भी जीवित है, जो हर सुबह 'गायत्री मंत्र' के जाप और अर्घ्य दान के रूप में पूरी दुनिया में अपनी ऊर्जा बिखेर रही है।
प्राचीन भारतीय इतिहास, भौगोलिक वर्गीकरण और सौर संस्कृति के विकास में शाकद्वीप, कीकट (मगध का प्राचीन नाम), मगध और गया की भूमि का अत्यंत अद्वितीय और घनिष्ठ संबंध रहा है। भविष्य पुराण, साम्ब पुराण और वराह पुराण के अनुसार, मगध की इस पवित्र धरा और यहाँ के 'मग' (मागध) ब्राह्मणों का संबंध सीधे सूर्य देव के प्रखर तेज, आरोग्य और मोक्षदायी रूपों से है। शाकद्वीप और 'मग' (मागध) ब्राह्मण: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शाकद्वीप (जो प्राचीन ईरान, मध्य एशिया या मकरान का क्षेत्र माना जाता है) सौर संस्कृति का मूल केंद्र था। वहाँ सूर्य देव को 'विवस्वान' (प्रखर तेज) और 'मित्र' (मैत्री और प्रकाश के देवता) के रूप में पूजा जाता था। वहाँ के पुजारियों को 'मग' (Maga) कहा जाता था। सौर संप्रदाय की स्थापना: भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब के आग्रह पर जब १८ अक्षौहिणी 'मग' ब्राह्मण भारत (विशेषकर मगध) आए, तब उन्होंने यहाँ व्यवस्थित 'सौर संप्रदाय' की स्थापना की। इन मग ब्राह्मणों के कारण ही इस क्षेत्र के निवासियों और वैद्यों को 'मागध' कहा गया । शाकद्वीप और सौर संप्रदाय के मूल में मुख्य रूप से 'विवस्वान' (अग्नि और तेज का स्वरूप) और 'मित्र' (चंद्रमा, समुद्र और सहयोग के स्वामी) आदित्य की ऊर्जा समाहित है। कीकट और मगध देश: 'धाता' और 'इंद्र' आदित्य का साम्राज्य था । कीकट (ऋग्वैदिक नाम) और मगध: ऋग्वेद में मगध क्षेत्र को 'कीकट' कहा गया है। यह क्षेत्र अपनी अत्यधिक ऊष्मा, प्रखर धूप और कृषि प्रधानता के लिए जाना जाता है।धाता आदित्य (चैत्र मास): धाता को 'सृष्टि और जीवों की रचना तथा पालन' का जिम्मा है। मगध की भूमि को सनातन काल से अन्न और ज्ञान के माध्यम से 'जगत का पोषण' करने वाली भूमि माना गया है। इसलिए यहाँ धाता आदित्य का सूक्ष्म साम्राज्य है। इंद्र आदित्य (श्रावण मास - देवराज): मगध और कीकट क्षेत्र में वर्षा ऋतु और बादलों के अधिपति 'इंद्र' का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि यहाँ की कृषि पूरी तरह वर्षा पर निर्भर थी।।. गया : 'विष्णु' और 'अर्यमन' आदित्य की प्रधानता - गयाजी की भूमि पूरे विश्व में केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि एक महा-साम्राज्य है, जहाँ आदित्यों के दो अत्यंत विशिष्ट रूपों का साक्षात् वास माना जाता है: विष्णु आदित्य (कार्तिक मास - संरक्षण और मोक्ष): भगवान सूर्य के बारह रूपों में एक रूप स्वयं 'विष्णु' हैं। गया को 'विष्णु नगरी' कहा जाता है, जहाँ भगवान विष्णु 'गदाधर' रूप में साक्षात् विराजमान हैं और पितरों को मोक्ष प्रदान करते हैं। कार्तिक मास में ही यहाँ त्रिपाक्षिक गया श्राद्ध की पूर्णाहुति और देश का महान सौर पर्व 'छठ महाव्रत' शुरू होता है। अर्यमन आदित्य (वैशाख मास - पितरों के स्वामी): वेदों और पुराणों में 'अर्यमन' (Aryaman) को पितरों का अधिपति (नेता) माना गया है। गया में किया जाने वाला श्राद्ध सीधे अर्यमन आदित्य को तृप्त करता है। इसलिए गया क्षेत्र में 'अर्यमन' और 'विष्णु' आदित्य का संयुक्त साम्राज्य और ऊर्जा क्षेत्र स्थापित है।
सौर संप्रदाय और मग (मागध) विवस्वान मूर्ति पूजा, सूर्य मंदिरों का निर्माण और धूप-उपासना होती है ।
कीकट और प्राचीन मगध देश धाता और इंद्र जीवों की उत्पत्ति, कृषि का पोषण और ऋतु चक्र का नियमन।
गया (गया क्षेत्र) विष्णु और अर्यमन मोक्ष प्रदाता ऊर्जा, पितृ लोक का नियंत्रण और आध्यात्मिक तेज।
निष्कर्ष रूप में: मगध, गया और शाकद्वीप की यह त्रिवेणी वास्तव में 'विवस्वान' (तेज), 'अर्यमन' (पितृ स्वरूप) और 'विष्णु' (मोक्ष स्वरूप) आदित्यों का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और भौगोलिक केंद्र है। यही कारण है कि आज भी संपूर्ण मगध क्षेत्र (जहानाबाद, औरंगाबाद, गया, पटना) में सूर्य उपासना की जड़ें दुनिया में सबसे गहरी हैं।
प्राचीन भारतीय इतिहास, पुराणों और वैश्विक पुरातात्विक साक्ष्यों के आलोक में द्वादश आदित्यों (12 आदित्यों) का साम्राज्य और उपासना स्थल अत्यंत व्यापक रहे हैं। भौगोलिक क्षेत्रों की जलवायु, संस्कृति और राजवंशों के उद्देश्यों के अनुसार अलग-अलग आदित्यों की उपासना की जाती थी।
: भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार आदित्यों का साम्राज्य और उपासना स्थल में मगध और उसके ऐतिहासिक सूर्यपीठ गया , देव, उमंगा, उलार आदि है।
मगध की भूमि ऐतिहासिक रूप से 'विवस्वान' (प्रखर तेज और आरोग्य) और 'धाता' (सृष्टि के पोषणकर्ता) आदित्य का मूल साम्राज्य रही है। भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा स्थापित प्रसिद्ध बारह अर्क स्थलों (सूर्यपीठों) में से कई इसी क्षेत्र में हैं: देव (औरंगाबाद, बिहार): यहाँ 'विवस्वान' आदित्य का साक्षात् साम्राज्य माना जाता है। त्रेतायुगीन यह मंदिर अपनी अनोखी वास्तुकला (पश्चिम मुखी) के लिए प्रसिद्ध है। उमंगा (मदनपुर, औरंगाबाद): यह उमंगेश्वरी और सूर्य उपासना का प्राचीन केंद्र है, जहाँ 'मित्र' और 'विवस्वान' रूप की संयुक्त ऊर्जा मानी जाती है। बेलाउर (भोजपुर, बिहार): यहाँ का प्राचीन राजा बाण असुर द्वारा निर्मित सूर्य मंदिर 'त्वष्टा' (सृष्टि के शिल्पी) और 'विवस्वान' आदित्य से संबद्ध है। ओंगारी (नालंदा, बिहार): यह साम्ब कालीन सूर्यपीठों में से एक है। यहाँ 'धाता' आदित्य की विशेष महत्ता है। उलार (पालीगंज, पटना): साम्ब द्वारा स्थापित प्रमुख अर्क स्थलों में से एक, जहाँ कुष्ठ रोग निवारण हेतु 'विवस्वान' (आरोग्य के देवता) की घोर उपासना की जाती है। हंडिया (नवादा, बिहार): यह द्वापरयुगीन सूर्यपीठ मगध नरेश जरासंध से जुड़ा है। यहाँ जलासय और सूर्य देव के 'विवस्वान' रूप की चिकित्सा पद्धति (आरोग्य) से संबंध है।बराबर पर्वत समूह का 'सूर्यांक गिरी' (जहानाबाद ): मौर्यकालीन वास्तुकला और विश्व की प्राचीनतम चट्टान-कट गुफाओं वाले इस क्षेत्र में 'अंशुमान' (कोमल किरणों के स्वामी) और 'अर्यमन' (पितृ स्वरूप) आदित्य का साम्राज्य माना जाता है, क्योंकि यह गया की मोक्ष भूमि के अत्यंत निकट है। पवई: यह भी मगध क्षेत्र का एक प्राचीन सूर्य उपासना स्थल है जहाँ 'भग' (ऐश्वर्य और तेज) आदित्य की महत्ता है अंग (भागलपुर क्षेत्र): महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण यहाँ के राजा थे। यहाँ 'विवस्वान' और 'भग' (ऐश्वर्य) आदित्य का साम्राज्य रहा। बज्जि और मिथिला (उत्तरी बिहार): यह विदेह राज का क्षेत्र रहा है। यहाँ 'मित्र' (सहयोग और शांति) और 'वरुण' (कृषि हेतु जल और वर्षा) आदित्य की उपासना मुख्य थी।
भोजपुर (पश्चिमी बिहार/पूर्वी उत्तरप्रदेश ): यहाँ अर्क स्थलों के प्रभाव के कारण 'विवस्वान' और 'धाता' आदित्य की प्रधानता रही। झारखंड: यहाँ की जनजातीय संस्कृति में सूर्य को 'सिंगबोंगा' कहा जाता है। प्रकृति और वनों के रक्षक के रूप में यहाँ 'त्वष्टा' (वृक्षों और औषधियों के अधिष्ठाता) आदित्य का साम्राज्य है। उत्तर प्रदेश - अयोध्या और काशी का क्षेत्र। अयोध्या सूर्यवंश की राजधानी होने के कारण यहाँ संपूर्ण द्वादश आदित्यों, विशेषकर 'इन्द्र' और 'विष्णु' आदित्य (जगत के संरक्षक) की उपासना का केंद्र रहा। उत्तराखंड: कटारमल सूर्य मंदिर (अल्मोड़ा)। यहाँ हिमालयी क्षेत्र में ठंड से रक्षा और तेज के लिए 'अंशुमान' और 'विवस्वान' आदित्य पूजे जाते हैं।।महाराष्ट्र: एरंडोल का सूर्य मंदिर। यहाँ 'मित्र' आदित्य की उपासना का प्राचीन इतिहास है।।कर्नाटक और आंध्रप्रदेश: इन क्षेत्रों में 'विष्णु' आदित्य और 'पूषा' (पोषण देने वाले) की उपासना चालुक्य और काकतीय काल में व्यापक थी। आंध्र का अरसावल्ली सूर्य मंदिर इसका मुख्य केंद्र है। तमिलनाडु: सूर्यनायर कोइल (कुंभकोणम)। यहाँ नवग्रहों के साथ 'विवस्वान' आदित्य सर्वोच्च रूप में पूजे जाते हैं। मध्यप्रदेश: उन्नाव का सूर्य मंदिर (दतिया) और चंदेरी क्षेत्र। यहाँ 'भग' और 'विवस्वान' आदित्य का प्रभाव रहा। राजस्थान: ओसियां का सूर्य मंदिर और जयपुर (गलताजी)। सूर्यवंशी कछवाहा और राठौड़ राजाओं के कारण यहाँ 'इन्द्र' (देवराज) और 'विवस्वान' (प्रखर क्षत्रिय तेज) का साम्राज्य माना गया।।बंगाल: सेन राजवंश के समय यहाँ 'धाता' और 'विवस्वान' आदित्य की पूजा अत्यंत लोकप्रिय थी। छत्तीसगढ़: यहाँ के प्राचीन आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में 'पूषा' (अन्न और वनस्पति के पोषण कर्ता) आदित्य का प्रभाव रहा। उड़ीसा: विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर। यह 'मैत्रेय वन' का क्षेत्र कहलाता है, इसलिए यहाँ साक्षात् 'मित्र' आदित्य और 'विवस्वान' का साम्राज्य स्थापित है।
. वैश्विक साम्राज्य का सौर संस्कृति - प्राचीन काल में वैश्विक सभ्यताओं में वैदिक आदित्यों को ही स्थानीय नामों से पूजा जाता था । नेपाल: काठमांडू घाटी और पाटन। यहाँ 'मार्तंड' (विवस्वान) और 'अंशुमान' आदित्य की उपासना प्राचीन काल से बौद्ध और हिंदू दोनों परंपराओं में है। श्रीलंका: यहाँ का मुन्नेस्वरम और त्रिंकोमाली क्षेत्र। लंकापति रावण स्वयं कश्यप गोत्र के थे, अतः यहाँ 'विवस्वान' और 'इन्द्र' आदित्य की ऊर्जा का प्रभाव माना जाता है। थाईलैंड और भूटान: थाईलैंड के राजपरिवार का खिताब 'राम' (सूर्यवंशी) है। यहाँ 'विष्णु' और 'मित्र' आदित्य का प्रभाव सांस्कृतिक रूप से है। चीन और रूस: प्राचीन स्लाविक (रूसी) संस्कृति में सूर्य देवता 'दाझबोग' (Dazhbog) को 'भग' आदित्य (भाग्य और ऐश्वर्य के प्रदाता) का प्रतिरूप माना जाता है। चीन में प्राचीन काल में 'ताई यांग' के रूप में सूर्य के 'विवस्वान' रूप की ऊर्जा को स्वीकारा गया। फ्रांस और इटली (रोम): रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म से पहले 'सोल इनविक्टस' (Sol Invictus - अजेय सूर्य) की पूजा होती थी, जो वैदिक 'विवस्वान' और 'मित्र' आदित्य का ही रूप थे। फ्रांस में 'केल्टिक' सौर संस्कृति में सूर्य को प्रकाश और न्याय का प्रतीक माना जाता था।।ईरान और इराक (मेसोपोटामिया): ईरान (शाकद्वीप का हिस्सा) 'मित्र' (Mithra) आदित्य का सबसे बड़ा वैश्विक साम्राज्य था। पारसी धर्म में 'अहुर मज्दा' का तेज सूर्य से ही है। इराक में सूर्य देव 'शमाश' थे, जो आदित्य के 'वरुण' (नैतिक व्यवस्था के रक्षक) रूप के समान थे। इंग्लैंड और अमेरिका: इंग्लैंड के 'स्टोनहेंज' (Stonehenge) को प्राचीन सूर्य वेधशाला माना जाता है, जहाँ ऋतु चक्र ('पर्जन्य' और 'त्वष्टा' आदित्य) की गणना होती थी। प्राचीन अमेरिका (माया और इंका सभ्यता) में 'इन्ती' (Inti) के रूप में 'विवस्वान' आदित्य का साक्षात् साम्राज्य था। मिस्र (Egypt): यहाँ सूर्य को 'रा' (Ra) और 'आतेन' (Aten) कहा जाता था। 'आतेन' सीधे तौर पर 'आदित्य' का रूपांतरण है। यहाँ सूर्य के 'धाता' (सृष्टिकर्ता) रूप का साम्राज्य था।
बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान: विभाजन से पूर्व ये भारत के ही अंग थे। पाकिस्तान का मुल्तान सूर्य मंदिर (साम्बपुर) पूरे एशिया में 'विवस्वान' आदित्य का सबसे बड़ा केंद्र था। अफगानिस्तान के खैराखाना (काबुल के पास) में सूर्य देव की भव्य मूर्तियां मिली हैं, जो 'विवस्वान' रूप की थीं। अरब: इस्लाम के आगमन से पूर्व प्राचीन अरब में 'शम्स' नाम की देवी/देवता के रूप में सूर्य की पूजा होती थी, जो 'भग' और 'विवस्वान' के तेज का ही प्रतीक थे।।राजवंशों, ऐतिहासिक शासकों और कथा-पात्रों के अनुसार आदित्यों की उपासना - इतिहास में राजाओं ने अपने लक्ष्यों (साम्राज्य विस्तार, वंश वृद्धि, प्रजा का पालन या मोक्ष) के अनुसार विशिष्ट आदित्यों की उपासना की: राजा बुध , इला और पुरुरवा: चंद्रवंश के आदि पुरुष राजा बुध ( वृहस्पति , तारा चंद्रमा के पुत्र) और इला (वैवस्वत मनु की पुत्री) तथा उनके पुत्र पुरुरवा व एल ने सौरमंडल में संतुलन और शांति के लिए 'मित्र' आदित्य (जो चंद्रमा और समुद्र के स्वामी हैं) की विशेष उपासना की थी, ताकि चंद्रवंश और सूर्यवंश में वैचारिक सामंजस्य बना रहे।
राजा वसु (उपरिचर वसु): चेदिराज वसु सूर्य और इंद्र के परम भक्त थे। इन्होंने बादलों के अधिपति और देवराज 'इन्द्र' आदित्य की उपासना की थी, जिससे उन्हें दिव्य विमान और न्याय की शक्ति प्राप्त हुई थी। जरासंध (मगध नरेश): जरासंध के पिता राजा बृहद्रथ ने संतान प्राप्ति के लिए महर्षि चण्डकौशिक की शरण ली थी। जरासंध ने मगध के हंडिया और गया क्षेत्र में 'धाता' आदित्य (जीवों की रचना करने वाले) और 'विवस्वान' की उपासना को बढ़ावा दिया, जिसके कारण उसे अजेय शारीरिक बल प्राप्त हुआ था। सहदेव (पांडव): महाभारत युद्ध के बाद मगध का राज्य जरासंध के पुत्र सहदेव को मिला था। सहदेव ने साम्राज्य की सुख-शांति और प्रजा के पोषण के लिए 'पूषा' और 'धाता' आदित्य की नियमित आराधना की थी।
सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य: चंद्रगुप्त मौर्य और उनके गुरु चाणक्य ने मगध साम्राज्य की सुदृढ़ता के लिए नैतिक व्यवस्था के रक्षक 'वरुण' आदित्य और ऐश्वर्य के देवता 'भग' आदित्य की नीतियों का पालन किया। मौर्य काल में ही बराबर पहाड़ियों और गया क्षेत्र में सौर-उपासकों (आजीवकों और ब्राह्मणों) को संरक्षण मिला।
कुषाण राजाओं (जैसे कनिष्क) के सिक्कों पर 'मिरो' यानी 'मित्र' आदित्य का अंकन मिलता है। गुप्त काल को 'सौर संस्कृति का स्वर्णकाल' कहा जाता है। कुमारगुप्त और स्कंदगुप्त के काल के 'मंदसौर शिलालेख' और 'इन्दौर ताम्रपत्र' सूर्य पूजा के साक्ष्य हैं। गुप्त सम्राटों ने जगत के पालनकर्ता 'विष्णु' आदित्य और प्रखर तेज के प्रतीक 'विवस्वान' की संयुक्त उपासना की (वे स्वयं को परमभागवत कहते थे, जहाँ सूर्य और विष्णु एक समान थे)। सम्राट हर्षवर्धन (वर्धन राजवंश): हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन, दादा आदित्यवर्धन और वे स्वयं 'परम सौर' (सूर्य के परम भक्त) थे। हर्ष ने अपने साम्राज्य की अखंडता, आरोग्यता और पापों के नाश के लिए प्रतिदिन 'विवस्वान' आदित्य की पूजा की और प्रयाग के महामोक्ष परिषद में सूर्य देव की अर्चना की थी।
पाल और सेन साम्राज्य (बंगाल/बिहार): सेन राजवंश के राजा (विजयसेन, लक्ष्मणसेन) स्वयं को 'परम सौर' कहते थे। उन्होंने साम्राज्य में कृषि की समृद्धि और कला के विकास के लिए 'त्वष्टा' (शिल्प के देवता) और 'धाता' आदित्य की उपासना को राजकीय संरक्षण दिया था। इस प्रकार, देव से लेकर मिस्र तक और राजा बुध से लेकर सम्राट हरन तक, आदित्यों की उपासना भौगोलिक आवश्यकता और राजाओं के आध्यात्मिक व राजनैतिक संकल्पों पर आधारित थी। जीवों के पोषण के लिए 'धाता', साम्राज्य के ऐश्वर्य के लिए 'भग', युद्ध में विजय और तेज के लिए 'विवस्वान' तथा मोक्ष व न्याय के लिए 'वरुण' व 'विष्णु' आदित्य की आराधना ही सनातन सौर संस्कृति का मूल आधार है।
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