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"​बंग-धरा पर नव प्रभात"

"​बंग-धरा पर नव प्रभात"

पंकज शर्मा
​पुण्य भूमि यह बंग-देश की, संतों की पावन क्यारी,
जहाँ विवेकानंद-सुभाष की, गूँजी वाणी अति भारी।
रवि ठाकुर के गीतों से, जिसकी माटी पुनः महक उठी,
उस धरती पर आज अचानक, नव-किरणें चहक उठीं।


​बरसों की उस कालिमा को, चीर निकल आया भास्कर,
मिटा कुहासा तुष्टि-नीति का, न्याय खड़ा है मुस्काकर।
अत्याचारों की जंजीरें, आज स्वयं ही टूट गईं,
हिंसा और आतंक की राहें, जन-बल से अब मुक्त हुई।


​श्यामा प्रसाद का वह सपना, जन-जन ने अब पाला है,
अटल अटूट संकल्पों ने, फिर से प्रगति दीप जलाया है।
रक्त-रंजित थी जो धरती, वह अब चंदन कहलायेगी,
मां भारती के वैभव की, पावन गाथा वह गायेगी।


​केसरिया बाना ओढ़े अब, दसों दिशाएँ डोल रहीं,
गूँज रहा है जय-घोष वहाँ, बाधाएँ पथ छोड़ रहीं।
सनातन का वह भगवा ध्वज, नभ-मण्डल पर लहराया,
शौर्य और संस्कृति का संगम, बंग-धरा पर है छाया।


​कमल खिला है उस कीचड़ में, जो छल से फैलाया था,
सत्य खड़ा है अडिग वहाँ, जिसने सबको हर्षाया था।
छलनाओं के दुर्ग गिरे अब, जन-गण का विश्वास जगा,
नई भोर की उस लाली में, सोता हुआ हुतात्मा जगा।


​वीर प्रसूता इस माटी ने, फिर अंगड़ाई ली भारी,
आतंकों की सत्ता हारी, जीत गई जनता प्यारी।
तुष्टीकरण के काले बादल, छँटकर दूर हुए सारे,
एक देश और एक विधान के, गूँज रहे पावन नारे।


​सुभाष के उस तेज़ पुंज का, फिर से दर्शन होता है,
विवेकानंद के चिंतन का, मन में अर्चन होता है।
त्याग-तपस्या और कर्म की, नई कहानी लिखी गई,
क्रांति और निर्माण की शक्ति, फिर से सबको दिखी गई।


​जयति-जयति हे बंग-भूमि! तू नव-प्रभात की आभा है,
सनातन के इस महायज्ञ में, अब तेरी भी आहुति होगी।
चिर-विजय का तिलक लगाकर, फिर तू गरिमामय होगी,
भारत माँ के मुकुट-मणि की, तू ही उज्ज्वल जय होगी।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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