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मगबंधु (अखिल): बेंगलुरु की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज़

मगबंधु (अखिल): बेंगलुरु की सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेज़

सत्येन्द्र कुमार पाठक
मग जागृति फाउंडेशन ट्रस्ट, रांची द्वारा प्रकाशित पत्रिका 'मगबंधु (अखिल)' का जनवरी-जून 2026 अंक न केवल एक पत्रिका है, बल्कि यह मग ब्राह्मणों की गौरवशाली परंपरा और सौर संप्रदाय की सांस्कृतिक विरासत का एक शोधपूर्ण संकलन है। डॉ. सुधांशु शेखर मिश्र के कुशल संपादन में निकला यह 'बेंगलुरु के मग ब्राह्मण विशेषांक' आधुनिकता और प्राचीनता के संगम को अत्यंत सूक्ष्मता से व्याख्यायित करता है।
पत्रिका की शुरुआत डॉ. सुधांशु शेखर मिश्र के सारगर्भित संपादकीय से होती है, जो अंक की आधारशिला रखता है। इसमें मग ब्राह्मणों के इतिहास और वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है। ४९ आलेखों का यह विशाल संग्रह इस बात का प्रमाण है कि संपादक ने विषय की गहराई को छूने के लिए व्यापक शोध और विभिन्न विद्वानों के दृष्टिकोणों को सम्मिलित किया है। इस अंक में सत्येन्द्र कुमार पाठक का आलेख 'बेंगलुरु: युगों का संगम' विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने बेंगलुरु जैसे आधुनिक शहर के भीतर छिपी ऐतिहासिक परतों को उधेड़ते हुए इसे मग संस्कृति से जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया है। वहीं, डॉ. मदनमोहन तरुण के विचार बेंगलुरु की बौद्धिक और साहित्यिक चेतना को एक नई ऊंचाई प्रदान करते हैं। भगवान परशुराम पर आधारित आलेख 'शास्त्र और चेतना के अक्षय पुंज' मग ब्राह्मणों के वीर और विद्वान चरित्र को प्रदर्शित करता है, जो शस्त्र और शास्त्र के संतुलन की सीख देता है। मग ब्राह्मणों का मूल आधार सौर संप्रदाय है। चेतन प्रकाश शर्मा द्वारा विश्व की सबसे ऊंची सूर्यदेव की प्रतिमा के निर्माण कार्य पर दिया गया विवरण इस अंक को समकालीन गौरव से जोड़ता है। साथ ही, श्रेयांश पांडेय का 'ऊं श्री सूर्यनारायण मंदिर बेंगलुरु' पर आलेख इस महानगर में सौर पूजा की जड़ों को मजबूती से प्रस्तुत करता है।
आचार्य अमरेंद्र मिश्र का ऋग्वेद के ऋषि मधुछंदा के पंचम सूक्त पर किया गया भाष्य पत्रिका की शास्त्रीय गंभीरता को दर्शाता है। यह लेख पाठकों को वेदों की उस ऋचाओं से जोड़ता है जो सृष्टि के आरंभिक ज्ञान का स्रोत रही हैं।
कमलेश पुण्यार्क का 'महाबंधु का उदयाचल ध्वज' और ज्योतींद्र मिश्र का 'ओडिशा विशेषांक' पर आलेख यह दर्शाते हैं कि मगबंधु केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार संपूर्ण भारत (अखिल) में है। मग ब्राह्मणों के संगठनात्मक ढांचे और उनके सामाजिक योगदान को इन लेखों के माध्यम से समझा जा सकता है।
पत्रिका में संकलित कविताएं और अन्य आलेख केवल पठनीय ही नहीं, बल्कि अनुकरणीय भी हैं। भाषा की शुद्धता और भावों की स्पष्टता इस अंक को एक संग्रहणीय ग्रंथ बनाती है। 'मगबंधु अखिल' का यह अंक सौर संस्कृति और बेंगलुरु के वास्तविक स्वरूप को सहेजने में सफल रहा है। यह अंक आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी जड़ों को पहचानने और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने के लिए एक मशाल (Light) की तरह कार्य करेगा। डॉ. सुधांशु शेखर मिश्र का यह प्रयास मग जागृति फाउंडेशन की ओर से समाज को दिया गया एक बहुमूल्य उपहार है, जो इतिहास के पन्नों में अपनी अमिट छाप छोड़ेगा।


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