Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

"गुरुत्व का स्वीकृति-संवाद"

"गुरुत्व का स्वीकृति-संवाद"

पंकज शर्मा
मैंने कभी चाहा था—
निर्भार होना,
जैसे आकाश में खोया कोई पंख,
जहाँ उड़ान ही अंतिम सत्य हो
और ठहराव
केवल एक भ्रम।

पर यह जीवन—
नदी किनारे बँधी एक नाव-सा,
मुझसे पूछता रहा चुपचाप—
क्या बिना गहराई के
कोई दिशा संभव है?

रिक्तता आकर्षित करती है,
पर वह थामती नहीं;
लहरों पर डोलती चेतना
कभी किनारा नहीं पाती,
जब तक भीतर
कोई भार न जागे।

मैं समझने लगा हूँ—
जिम्मेदारियाँ बंधन नहीं,
वे अदृश्य लंगर हैं,
जो भीतर के कंपन को
एक मौन स्थिरता देते हैं।

जब किसी की अपेक्षा
कंधों पर उतरती है,
तब पग डगमगाते नहीं,
वे एक अनकहे संकल्प से
धरती में धँसने लगते हैं।

अजीब है यह रहस्य—
जो थकाता है, वही टिकाता है;
जिससे बचना चाहता हूँ,
वही मुझे
मेरे केंद्र तक लौटा लाता है।


निर्भार स्वतंत्रता—
रेत की तरह बिखर जाती है,
हर झोंके के साथ;
और भार ही है,
जो अस्तित्व को आकार देता है।


अब मैं विरोध नहीं करता—
इस गुरुत्व से,
इस आंतरिक दायित्व से;
क्योंकि इसी में छिपा है
मेरा संतुलन,
और मेरी मौन पूर्णता।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ 
 (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ