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साड़ी : नारीत्व का श्रृंगार

साड़ी केवल परिधान नहीं, भारतीय नारीत्व की गरिमा, संस्कृति और आत्मीयता का अनुपम श्रृंगार है।हर आँचल में ममता, मर्यादा और भारतीयता की सुगंध बसती है।

साड़ी : नारीत्व का श्रृंगार

कुमार महेंद्र
भारतीय संस्कृति के उर में,
नारी देवी-सी सम्मानित।
संस्कारों की सरिता पावन,
हिय मर्यादा-परंपरा धारित।
सदियों से गौरव-गरिमा का,
परिवार-समाज का आधार।
साड़ी नारीत्व का श्रृंगार।।


ऋग्वेदों की पावन वाणी,
यजुर्वेदों का है संकेत।
यज्ञ, हवन, व्रत, उपासना में,
इसका गौरव रहा विशेष।
“वासस” “अधिवासस” उपमाएँ,
दर्शाएँ आदर अपार।
साड़ी नारीत्व का श्रृंगार।।


रंग-रूप आकार अनेकों,
भौगोलिक पहचान सेतु।
रूचि-अभिरुचि संग सहेजे,
संस्कारों के माधुर्य हेतु।
सहज, सुसज्जित, शालीनता का,
यह अनुपम अनमोल उपहार।
साड़ी नारीत्व का श्रृंगार।।


कांजीवरम की दिव्य आभा,
बनारसी का गौरव गान।
पटोला, नौवारी की छवि में,
झलके भारत की पहचान।
चंदेरी, कांथा, बंधेजों में,
लोक-रंग झिलमिल बहार।
साड़ी नारीत्व का श्रृंगार।।


महेश्वरी, तसर, बालूछरी,
मूंगा-रेशम की मधुर चमक।
हकोबा की कोमल कारीगरी,
मन में भर देती है दमक।
हर आँचल में बसी हुई है,
ममता, मर्यादा, सत्कार।
साड़ी नारीत्व का श्रृंगार।।


नारी के कोमल व्यक्तित्व का,
यह अनुपम गौरव-अभिमान।
भारतीयता की सुरभि समेटे,
रचती संस्कृति का सम्मान।
तन पर केवल वस्त्र नहीं यह,
आत्मा का पावन संसार।
साड़ी नारीत्व का श्रृंगार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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