बरखू
अरुण दिव्यांशबरखू अईलन हरखू से मिले ,
हहनात घहनात रे ।
पानी के अब लगन जागल ,
आ गईल बरसात रे ।।
घाटा घेरी करिया करिया ,
भडाका फोड़ी भड़ाक से ।
रात के दिन बनावे खातिर ,
बिजली कड़की कड़ाक से ।।
दिनों में अब त घाटा घेरी ,
दिन में बुझाई रात रे ।
टर्च बत्ती अब संग में रखीं ,
साॅंप बिच्छी करी घात रे ।।
झींगुर दा के बाजी शहनाई ,
दादुर रहिहें साथ में ।
इंद्र भगवान बिन घाम खूबे ,
बरखू उनके हाथ में ।।
इंद्र भगवान के हाथी घोड़ा ,
झूम के चली बारात रे ।
मयूर रानी नचिहें झूमझूम ,
सुहावन बीती रात रे ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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