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"देहरी के पार : एक अंतर्यात्रा"

"देहरी के पार : एक अंतर्यात्रा"

पंकज शर्मा
कलम थम गई
और शब्दों के पार
मौन का एक विराट आकाश
धीरे-धीरे खुलने लगा।


अभिव्यक्ति जहाँ समाप्त हुई,
वहीं से आरम्भ हुआ
एक ऐसा संवाद
जिसका कोई उच्चारण नहीं।


यह अंतस की वह ध्वनि है
जो किसी बाह्य कोलाहल से नहीं,
ज्ञात के समस्त तटबंध तोड़
अज्ञेय में विलीन होने से जन्मी है।


बुद्धि ने अब तक
जो कुछ सत्य समझ सँजोया था,
इस देहरी पर आते ही
वह धूल-सा झर गया।


तर्क के आलोक
अचानक क्षीण पड़ गए,
जब चेतना ने
शून्य के असीम एकांत को छुआ।


यह देहरी केवल चौखट नहीं—
यह ज्ञान और विस्मृति के बीच
ठहरा हुआ वह क्षण है
जहाँ पुराना ‘मैं’ गलने लगता है।


वपु—यह दृश्य काया,
अब स्वयं को ही अपरिचित लगती है;
मानो आत्मा ने
अपने ही आवरण से दूरी बना ली हो।


ग्रंथों में खोजा गया सत्य
यहाँ किसी सूत्र में नहीं मिलता;
वह तो इस निस्पंद एकांत में है,
जहाँ प्रमाण भी मौन हो जाते हैं।


यह विस्मय, यह संशय,
किसी निष्कर्ष की याचना नहीं करता;
यह केवल ‘होने’ की
एक अनाम अवस्था है।


अब न कोई पथ शेष है,
न कोई अंतिम गंतव्य—
केवल अजनबीयत का
एक अथाह प्रवाह।


और थमी हुई कलम
अब उसी आदि-मौन को लिख रही है
जो शब्दों में नहीं,
केवल अनुभव में जीवित रहता है॥


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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