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मंत्रमुग्ध जग सारा,यौवन-लावण्य की बहारों पर

मंत्रमुग्ध जग सारा,यौवन-लावण्य की बहारों पर

कुमार महेंद्र
तेरी मुस्कान में जैसे सावन उतर आया हो,
तेरी अदाओं में कोई मधुर गीत गुनगुनाया हो…
यौवन-लावण्य की हर झलक में बस तेरा ही अहसास,
और उस अहसास में डूबा मेरा हर एक श्वास।
“मंत्रमुग्ध जग सारा, यौवन-लावण्य की बहारों पर”
— जहाँ रूप भी प्रेम बन जाए और प्रेम ही कविता
✍️ कुमार महेंद्र




मोहक केश कृष्ण घटाएं,
सांझ-निशा संग इठलाती।
चारु चंद्र-सी चंचल छवि,
नयन-दीपिका झिलमिलाती।
अरुणिम बिंदियां दीप्त शिखाएं,
झुमके थिरकें श्रृंगारों पर।
मंत्रमुग्ध जग सारा, यौवन-लावण्य की बहारों पर।।


अधर-कपोल रंग रंगे,
अंग-अंग मधु का विस्तार।
मुखमंडल हँसी-निर्झरिणी,
क्षण-क्षण रचे नवल त्यौहार।
सादगी में छिपा वैभव,
प्रणय झरे मणि-हारों पर।
मंत्रमुग्ध जग सारा, यौवन-लावण्य की बहारों पर।।


कलाई-कंगन कथा कहें,
खनक उठे मौन स्पंदन।
हृदय-सलिल में स्नेह तरंगे,
प्रेम रचे मधुर वंदन।
कटि-कंचुकी लय में बंधी,
लहंगा बोले झंकारों पर।
मंत्रमुग्ध जग सारा, यौवन-लावण्य की बहारों पर।।


पायल रुनझुन रागिनी,
मेहंदी रचे मधुर इकरार।
लचक-झलक जीवन-संगीत,
लावण्य जगे हर अंतर तार।
किन्तु समय की तीखी धूप,
छाया तोड़े स्वप्निल आधारों पर।
मंत्रमुग्ध जग सारा, यौवन-लावण्य की बहारों पर।।


दर्पण-दर्पण जग देखे,
रूप-रंग का क्षणिक उजास।
भीतर के अनंत शून्य में,
कितना दुर्लभ सच्चा प्रकाश।
जो अंतस से दीप्त हुआ,
वही अमर है विस्तारों पर।
मंत्रमुग्ध जग सारा, यौवन-लावण्य की बहारों पर।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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