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है ग़रीबी देश में सब कह रहे,

है ग़रीबी देश में सब कह रहे,

बेरोज़गारी बढ़ रही है कह रहे।
भीड़ होटल बाज़ार है सब जगह,
महँगाई से पीड़ित सब कह रहे।


बाहर खाने का चलन अब बढ़ गया,
गाड़ी से जाने का चलन बढ़ गया।
सज गये बाज़ार ब्रांडिड कपड़ों से,
दिखावे का चलन घरों में बढ गया।


कार लेने जाईये, तुरन्त मिलती नही,
बाईक की भी बुकिंग, मिलती नही।
होटल में भी लाईन बाहर तक लगी,
महँगाई होटल बाज़ार में मिलती नही।


घर की मठरी और लड्डू खो गये,
सब बाज़ार के गुलाम ही हो गये।
आचार घर में कहाँ कोई बनाता,
पापड़ कचरी सब बाज़ारी हो गये।


सरकारी स्कूलों में बच्चे पढ़ाना तौहीन है,
प्राईवेट स्कूलों में पढ़ाना हमारी मुहिम है।
परिवार संग एक घर में अब कौन रहता,
तन्हा रहने की ख्वाहिश, सभी शौक़ीन हैं।


कह रहे नेता यहाँ बेरोज़गारी बहुत है,
कामगार मिलते नहीं दुश्वारी बहुत है।
खेत बंजर बन रहे, बच्चे खेती से बचें,
हर कदम दलाल, भ्रष्टाचारी बहुत हैं।


चाऊमीन पिज्जा बर्गर, गाँव में भी छा गये,
ए सी कूलर टी वी पंखे, क़र्ज़े कर आ गये।
गाँव में चौपालों का दौर पुराना चला गया,
मिल बैठ कर बातें करना, मोबाइल खा गये।


महँगाई पर बयानबाजी, चलन में देखी यहाँ,
विरोध में बयानबाजी, विरोधियों की देखी यहाँ।
रोज़ जाते होटलों में, बयान टमाटर महँगाई पर,
महँगाई की मार पड़ती, अमीरों पर देखी यहाँ।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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