खेल है सब दृष्टि और दृष्टिकोण का,
पतझड़ में पत्ता झड़ गया, या गौण का।उपयोगी बने टूटकर भी, हमारे हाथ है,
नवसृष्टि के सृजन और हमारे मौन का।
क्यों रहें कुंठित हम, उम्र के इस मुकाम से,
क्यों अपेक्षा सब चलें, हमारे दृष्टिकोण से?
कुछ व्यथित हैं देश में, राष्ट्र के विकास से,
हम प्रसन्न विश्व मे, भारत के गौरव गान से।
ख़ामियाँ अपनी ही हैं, जो गुलाम बन रहे,
सुविधा भोगी बने, मुफ्त माल पर तन रहे।
कब तलक निज नाकामियाँ, दोष ग़ैरों पर,
वक्र गति चलते रहे, जब तलक संग धन रहे।
कुछ विकलांग शारीरिक, दिव्यांग कह मान दिया,
दिव्यांगों के कल्याण हित, शासन ने सम्मान दिया।
हैं बहुत से कुंठित यहाँ, राष्ट्र हितों पर ध्यान नहीं,
मानसिक विकलांगो ने, तुष्टिकरण को स्थान दिया।
है कोई अशक्त निर्धन, मुफ्त राशन दीजिए,
समर्थ वह बन सके, मुफ्त संसाधन दीजिए।
मुफ्त योजनाओं की, समीक्षा भी जरूरी है,
सक्षम- समर्थ को, स्वाभिमान चिंतन दीजिए।
अ कीर्ति वर्द्धन
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