भारतीय ज्ञान परंपरा और बाल साहित्य
सत्येन्द्र कुमार पाठक
साहित्य किसी भी समाज का दर्पण होता है, लेकिन बाल साहित्य उस समाज की आधारशिला होता है। यह वह उर्वर भूमि है जहाँ भविष्य के नागरिकों के चरित्र, नैतिकता और बौद्धिक क्षमता के बीज बोये जाते हैं। मेरे जीवन के चार दशकों का शैक्षणिक अनुभव और पत्रकारिता व इतिहास लेखन की लंबी यात्रा ने मुझे यह सिखाया है कि यदि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत और नदियों के अस्तित्व को बचाना चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत हमें बच्चों के मन से करनी होगी। बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का एक सशक्त अनुष्ठान है।
भारतीय बाल साहित्य की जड़ें अत्यंत गहरी और समृद्ध हैं। आधुनिक युग में जिसे हम 'स्टोरीटेलिंग' कहते हैं, वह हमारे वेदों और उपनिषदों में 'आख्यान' और 'संवाद' के रूप में युगों से विद्यमान है। ऋग्वेद के मंत्रों में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। ऊषा, सूर्य और इंद्र के वर्णन बच्चों की कल्पनाशक्ति को विस्तार देते हैं। सरमा-पणि संवाद जैसे सूक्त पशु-कथाओं के प्राचीनतम रूप हैं । कठोपनिषद् में बालक नचिकेता की जिज्ञासा और यमराज से उसका तर्कपूर्ण संवाद साहस की पराकाष्ठा है। वहीं, छांदोग्य उपनिषद में सत्यकाम जाबाल की कथा सत्यनिष्ठा का वह पाठ पढ़ाती है, जो आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक है। पिता उद्दालक द्वारा पुत्र श्वेतकेतु को 'पानी और नमक' के उदाहरण से समझाना आज की आधुनिक शिक्षण पद्धति (Activity-based learning) का ही प्राचीन स्वरूप है। पंचतंत्र: विश्व का पथ-प्रदर्शक आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित 'पंचतंत्र' विश्व का सबसे प्राचीन और सफल बाल साहित्य है। यम से कूटनीति, व्यवहार और नैतिकता सिखाने की यह कला आज भी बेजोड़ है।
बाल साहित्य केवल एक शब्द नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का बोध होना चाहिए।आधुनिक काल में बाल साहित्य का स्वरूप बदला है। आज यह केवल उपदेशात्मक न रहकर विविध और वैज्ञानिक हो गया है। आज बाल कहानी, बाल कविता, बाल नाटक और बाल पहेलियाँ बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनके संवाद कौशल को बढ़ा रही हैं। हास्य-व्यंग्य के माध्यम से बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान देना अधिक प्रभावी सिद्ध हो रहा है। भारतेंदु हरिश्चंद्र से शुरू हुई आधुनिक यात्रा प्रेमचंद, सुभद्रा कुमारी चौहान और हरिवंश राय बच्चन जैसे महान रचनाकारों से होती हुई आज के समय में 'चंपक' और 'नंदन' जैसी पत्रिकाओं तक पहुँची है। वर्तमान में साहित्यकार नई तकनीक और बाल मनोविज्ञान के तालमेल से इसे और समृद्ध कर रहे हैं।
क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व: मगही, भोजपुरी, मैथिली और अंगिका , हरियाणवी , जैसी लोक भाषाओं में रचा गया साहित्य बच्चों को अपनी माटी की खुशबू से जोड़ता है। मातृभाषा में शिक्षा और साहित्य ही बालक के मौलिक चिंतन को विकसित कर सकता है। एक शिक्षक और लेखक के तौर पर मेरा मानना है कि बाल साहित्य सृजन एक तपस्या है। इसके लिए कुछ बिंदुओं का ध्यान रखना अनिवार्य है:: भाषा ऐसी हो जो बच्चे के दिल तक उतरे, न कि उसके सिर के ऊपर से गुजर जाए। : विषय-वस्तु बच्चे की उम्र के अनुसार हो। हमें उसे 'उपदेश' नहीं देना है, बल्कि उसे 'अनुभव' करने का अवसर देना है। बच्चों को सोचने के लिए प्रेरित करें। पहेलियाँ और विज्ञान कथाएँ उनकी तार्किक शक्ति को बढ़ाती हैं।
बाल साहित्य राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का वह माध्यम है जो शांत और मौन तरीके से भविष्य का निर्माण करता है। मेरी रचनाएँ—चाहे वह 'मगध क्षेत्र की विरासत' हो या 'साहित्य मंथन'—सदैव इस बात की पक्षधर रही हैं कि हम अपनी प्राचीन मेधा (वेदों-उपनिषदों का ज्ञान) और आधुनिक विज्ञान के बीच एक सेतु बनाएं।जब तक हम अपने पोते-पोतियों और देश के तमाम बच्चों को अपनी विरासत, अपनी नदियों और अपनी भाषा के प्रति सजग नहीं करेंगे, तब तक हमारी लेखनी का उद्देश्य अधूरा रहेगा। साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण का समन्वय ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकता है।
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