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"बेदरदी गरमी"

"बेदरदी गरमी"

(मगही लोक-गीत)
रचना --- डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
(टेक)
_कहमा से खरीदूं बरफ़ मलाई,_
_रोज ताना मारेला घर में लुगाई।।_
बंद १:
भीषण हे गरमी छूटेला पसीना,
मुश्किल भइल अईसन में जीना।
बालटी के पनीया अदहन हो जाई,
ए बबुआ पीला पर मन पछताई।
_कहमा से खरीदूं बरफ़ मलाई,_
_रोज ताना मारेला घर में लुगाई।।_


बंद २:
फ्रिजवा के पानी से होवे बीमारी,
बेदरदी धूप में आवे घूमारी।
मिट्टी सुरहीआ के दाम बढ़ी जाई,
ए बबुआ खीरा ककड़ी किनलो न जाई।
_कहमा से खरीदूं बरफ़ मलाई,_
_रोज ताना मारेला घर में लुगाई।।_


बंद ३:
लू के थपेड़ा से सूखेला बदनवा,
नदी-पोखरिया सब हो गइल सूखनवा।
छइयाँ में बैठल मन बहल ना पाई,
ए बबुआ टिकोला के पन्ना पियाई।
_कहमा से खरीदूं बरफ़ मलाई,_
_रोज ताना मारेला घर में लुगाई।।_


बंद ४:
कूलर-पंखा सब हार गइल आजू,
बिजुरी कटे तऽ चले ना हिया-बाजू।
रातियो में नींदिया ठीक से ना आई,
ए बबुआ छत पर चटई बिछाई।
_कहमा से खरीदूं बरफ़ मलाई,_
_रोज ताना मारेला घर में लुगाई।।_


बंद ५:
खेत,बधार,ताल सुखल तड़पे मछली,
पियास से तरसे गोरू अउर बछड़ी।
मेघवा कब आई, अंखिया तरसाई,
ए बबुआ बादर के खबरिया सुनाई।
_कहमा से खरीदूं बरफ़ मलाई,_
_रोज ताना मारेला घर में लुगाई।।_


बंद ६:
गमछा भिजा-भिजा माथे पर धराई,
निमिया के छइयाँ में जनमा बचाई।
दिनवा कटे ना, 'राकेश' अकुताई,
ए बबुआ जीरा के शरबत बनवाई।
_कहमा से खरीदूं बरफ़ मलाई,__रोज ताना मारेला घर में लुगाई।।_
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