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"भीतर का द्वंद्व"

"भीतर का द्वंद्व"

पंकज शर्मा
मैं अपने ही भीतर
दो दिशाओं में बँटा खड़ा हूँ—
एक ओर तर्क का स्पष्ट, ठोस मार्ग,
दूसरी ओर
अनाम संकेतों से भरी
एक धुँधली-सी रोशनी।


तर्क कहता है—
हर सत्य को प्रमाण दो,
हर निर्णय को कसौटी पर रखो;
पर अंतर्मन चुपचाप पूछता है—
क्या हर अनुभूति को
शब्दों में बाँधा जा सकता है?


मैंने कई बार
गणनाओं के सहारे
जीवन को समझना चाहा,
पर हर बार
कुछ अनकहा
उँगलियों से फिसलता रहा।


वह जो भीतर बोलता है,
न तो शोर करता है
न ही तर्क करता है,
फिर भी उसकी निस्तब्धता में
एक अजीब-सी निश्चितता है—
जैसे कोई जानता हो
बिना जाने हुए।


और मैं—
सभ्यता के बीच खड़ा,
अपने ही बनाए नियमों में उलझा,
सेवक को सिंहासन पर बैठाकर
उस स्वामी को भूल आया हूँ
जो कभी प्रश्न नहीं करता था।


क्या यह संभव है
कि मैं लौट सकूँ
उस प्रथम स्पंदन तक,
जहाँ विचार जन्म लेने से पहले
सिर्फ अनुभूति होती है?


शायद उत्तर
न तर्क में है, न निष्कर्ष में,
बल्कि उस विराम में छिपा है
जहाँ मैं स्वयं से
बिना किसी प्रमाण के मिलता हूँ।


और तब—
न अंतर्ज्ञान विजयी होता है,
न तर्क पराजित,
बस एक संतुलन जन्म लेता है,
जिसमें "मैं"
अपने ही भीतर
पहली बार संपूर्ण होता हूँ।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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