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“प्रेम का स्वर”

“प्रेम का स्वर”

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
प्रेम भीगी घटा, प्रेम मुस्कान है,
प्रेम सूना सफर, प्रेम अरमान है।
प्रेम नखरे करे, प्रेम नखरे सहे,
प्रेम भोला लगे, प्रेम तूफान है।
प्रेम भीगी घटा, प्रेम मुस्कान है॥


प्रेम ठहरी नज़र, प्रेम उड़ान है,
प्रेम बंजर धरा, प्रेम वरदान है।
प्रेम रूठा कभी, प्रेम हँसता कभी,
प्रेम अपना लगे, प्रेम अनजान है।
प्रेम ठहरी नज़र, प्रेम उड़ान है॥


प्रेम पावन धरा, प्रेम आकाश है,
प्रेम कोमल स्पर्श, प्रेम एहसास है।
प्रेम चुप भी रहे, प्रेम सब कुछ कहे,
प्रेम जीवन-रस, प्रेम ही श्वास है।
प्रेम पावन धरा, प्रेम आकाश है॥


प्रेम प्यासी तड़प, प्रेम ही प्यास है,
प्रेम लंबी विरह, साँस की आस है।
प्रेम खुद को मिटा, प्रेम अर्पण बने,
प्रेम दूर रहे, प्रेम ही पास है।
प्रेम प्यासी तड़प, प्रेम ही प्यास है।।


प्रेम जलती शिखा, प्रेम ही राग है,
प्रेम सर्वस्व दे, प्रेम वैराग है।
प्रेम आंसू बहा, प्रेम ही मुस्कुरा,
प्रेम चंदन बने, प्रेम ही आग है।
प्रेम जलती शिखा, प्रेम ही राग है।।
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