जीवन चिंतक
अरुण दिव्यांशकौन जीवन मीत है ,
कौन जीवन मौत ।
कौन जीवन जीत है ,
कौन जीवन सौत ।।
आ इसे पहचान ले ,
हॅंसी खुशी ज्ञान ले ।
कौन अपना पराया ,
इसे भी तू जान ले ।।
कौन तेरा है घातक ,
कौन तेरा है पातक ।
मानव मान बना है तू ,
कौन तेरा है छातक ।।
हाथ ले तू हाथ दे ,
हाथों में तू हाथ दे ।
साथ ले तू साथ दे ,
माथ ले तू माथ दे ।।
सृष्टि से ही सृष्ट है ,
सृष्टि का तू पृष्ठ है ।
मानव मन मान है ,
क्यों बना तू तृष्ट है ।।
छातक = आश्रय , माथ = सलाह ,
तृष्ट = प्यासा ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश छपरा (सारण ) बिहार ।
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