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तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय

तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय

अरुण दिव्यांश
जैसे यह आई उषा किरण ,
निशा का प्रलय हो गया ।
तुम्हें देख अंकुरित प्रणय ,
चुपके तम भी खो गया ।।
निशा ग‌ई जो थी मतवाली ,
उषा आई ले भोर निराली ।
संदेश दौड़ाया तब खगों ने ,
निशा ग‌ई मुख ले काली ।।
रवि का देख रव है आया ,
भानू को देख भान हुआ ।
दिखा दिव दिवा दिव्यता ,
तिमिर का अवसान हुआ ।।
जैसे ही सूर्य सौर्यमंडल में ,
अंकुरित बीज है बो गया ।
तुम्हें देख अंकुरित प्रणय ,
शयन कक्ष तम सो गया ।।
उषा तन में उर्जा है भरती ,
निशा तन उतारे थकान ।
उषा निशा बहनें मिलकर ,
तन को देती नव विहान ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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