आज यहाँ द्वैत के तर्क और विरक्ति की शून्यता को दर्शाता एक दार्शनिक दृष्टिकोण की रचना प्रस्तुत कर रहा हूं।
"चेतना का द्वंद्व"
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"यह जगत एक दर्पण है,
जहाँ दृश्य ही द्रष्टा बन बैठा,
अद्वैत की अनंतता में,
द्वैत का एक भ्रम पनप बैठा।
जहाँ 'ज्ञात' और 'ज्ञाता' के बीच,
एक कल्पित रेखा खिंचती है,
वहीं से द्वैत की परिभाषा,
संसार का ताना-बाना बुनती है।
तर्क की कसौटी पर जब,
'स्व' को 'पर' से तौला जाता है,
तब मन बुद्धि के पिंजरे में,
स्वयं ही कैद हो जाता है।
यह द्वैत ही है जो जन्म देता है
इच्छा, भय और संताप को,
जो खंडित कर देता है,
चेतना के अखंडित प्रताप को।
किंतु, जब तर्क थक कर हारता है,
और प्रश्न मौन हो जाते हैं,
तब विरक्ति के सूक्ष्म अंकुर,
शून्य की कोख से आते हैं।
विरक्ति पलायन नहीं है,
न ही विमुख होना यथार्थ से,
यह तो बोध है उस विसंगति का,
जो जन्मी है स्वार्थ से।
जब राग और द्वेष के तंतु,
अपनी पकड़ ढीली करते हैं,
जब 'होने' और 'न होने' के
अर्थ, अर्थहीन से लगते हैं।
तब विरक्ति एक तटस्थता है,
एक मौन साक्षी भाव सा,
जहाँ द्वैत विलीन होता है,
पाकर बोध के प्रभाव को।
न कोई द्वंद्व शेष रहता,
न कोई दूसरा द्वार बचता है,
विरक्ति की पराकाष्ठा पर ही,
सत्य स्वयं को रचता है।
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