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आचार्यकुल का स्वप्न और भूदान की क्रांति: विनोबा भावे

आचार्यकुल का स्वप्न और भूदान की क्रांति: विनोबा भावे

सत्येंद्र कुमार पाठक , राष्ट्रीय प्रवक्ता , आचार्यकुल
आध्यात्मिक मानवतावाद का उदय के लिए आधुनिक भारत के इतिहास में आचार्य विनोबा भावे एक ऐसी शख्सियत रहे हैं, जिन्होंने सभी का उदय के सपने को केवल प्रार्थना सभाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे धरातल पर उतारने का भगीरथ प्रयास किया। विनोबा जी के 'आध्यात्मिक उत्तराधिकारी' थे। उनके द्वारा शुरू किए गए 'भूदान आंदोलन' और 'आचार्यकुल' केवल संस्थाएं या घटनाएं नहीं थीं, बल्कि वे अहिंसा, करुणा और सामाजिक न्याय पर आधारित एक नई सामाजिक व्यवस्था का घोषणापत्र थे। इतिहास साक्षी है कि समाज में परिवर्तन के दो ही मार्ग रहे हैं—एक सत्ता की शक्ति (कानून) और दूसरा 'हृदय परिवर्तन'। विनोबा भावे ने दूसरे मार्ग को चुना। उन्होंने सिद्ध किया कि करुणा के माध्यम से संपत्ति के मोह को जीता जा सकता है और सामाजिक विषमता की गहरी खाई को बिना किसी रक्तपात के भरा जा सकता है।
पोचमपल्ली: एक ऐतिहासिक चिंगारी १८ अप्रैल १९५१ का दिन भारतीय समाजशास्त्र में एक स्वर्ण अक्षरों में दर्ज तिथि है। तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव में जब विनोबा जी पदयात्रा पर थे, तब वहां के अछूत (हरिजन) परिवारों ने अपने भरण-पोषण के लिए ८० एकड़ भूमि की मांग की। विनोबा जी ने सभा में उपस्थित लोगों से पूछा कि क्या कोई इनके लिए अपनी जमीन दे सकता है? तभी रामचंद्र रेड्डी नामक एक जमींदार ने १०० एकड़ भूमि दान करने की घोषणा कर दी। यही वह क्षण था जब 'भूदान' का जन्म हुआ। विनोबा जी ने महसूस किया कि यदि प्रेम से भूमि मांगी जाए, तो लोग देने को तैयार हैं। यहाँ से शुरू हुई वह पदयात्रा केवल एक व्यक्ति का भ्रमण नहीं था, बल्कि वह करोड़ों भूमिहीनों के सम्मान की पुनः स्थापना थी। विनोबा जी ने 'सबै भूमि गोपाल की' का जो घोष किया, उसने सामंती ढांचे की जड़ों को बिना किसी हिंसा के हिला कर रख दिया।
आचार्यकुल के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य डॉ पूर्व कुलपति धर्मेंद्र के णेतृत्व में आचार्यकुल एवं विनोबा जी की सिद्धांतों को जन्मस में लाने का कार्य किया गया है । आचार्यकुल का राष्ट्रीय , अंतरराष्ट्रीय तथा प्रांतीय अधिवेशन में जय जगत एवं सर्वे भवन्तु सुखिन : का मंत्र दिया जा रहा है । आचार्यकुल का राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन 2024 एवं 2025 को बोधगया , प्रांतीय अधिवेशन झारखंड प्रान्त आचार्यकुल का रांची और बिहार प्रान्त आचार्यकुल अधिवेशन मुजफ्फरपुर में सुनिश्चित है ।
बिहार और झारखंड: त्याग का वैश्विक केंद्र में भूदान आंदोलन के इतिहास में संयुक्त बिहार (वर्तमान बिहार एवं झारखंड) की भूमिका सबसे अग्रणी रही। यदि दक्षिण भारत में इस आंदोलन की शुरुआत हुई, तो उत्तर भारत के इस भूभाग ने इसे एक जन-क्रांति का रूप दे दिया। विनोबा जी ने बिहार को अपने 'प्रयोग की भूमि' बनाया और यहाँ के लोगों ने उनके आह्वान पर हृदय खोलकर अपनी संपत्ति समर्पित कर दी। आंकड़े बताते हैं कि पूरे भारत में प्राप्त कुल भूमि का एक बड़ा हिस्सा अकेले इसी क्षेत्र से आया। यहाँ के राजाओं, महाराजाओं से लेकर सामान्य सीमांत किसानों ने अपनी स्वेच्छा से लगभग २१.१७ लाख एकड़ भूमि का दानपत्र विनोबा जी को सौंपा।
झारखंड के पठारी और वनांचल क्षेत्रों में भूमि दान की मात्रा विस्मित करने वाली थी। यहाँ के लोगों ने सिद्ध कर दिया कि 'आदिवासी और मूलवासी' संस्कृति में प्रकृति और समाज के प्रति समर्पण की भावना कितनी गहरी है। हजारीबाग का ऐतिहासिक दान: रामगढ़ राज के महाराजा कामाख्या नारायण सिंह ने अकेले ९,००,००० एकड़ (९ लाख एकड़) से अधिक भूमि दान की। यह न केवल भारत बल्कि विश्व इतिहास का सबसे बड़ा व्यक्तिगत भूमि दान माना जाता है। इस एक दान ने वैश्विक स्तर पर यह संदेश दिया कि अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए बड़ी से बड़ी संपत्ति का त्याग संभव है।
पलामू और गढ़वा का योगदान: यहाँ रंका राज के राजा बहादुर गिरिधर नारायण सिंह ने १,०२,००१ एकड़ और नमूदाग एस्टेट ने १.०१ लाख एकड़ भूमि समर्पित की। यह वह क्षेत्र थे जो आर्थिक रूप से पिछड़े माने जाते थे, लेकिन वैचारिक रूप से इन्होंने पूरे देश को दिशा दिखाई। रांची और संताल परगना: इन क्षेत्रों से भी लगभग १.५ लाख एकड़ भूमि प्राप्त हुई। यहाँ 'ग्रामदान' की अवधारणा को विशेष बल मिला, जहाँ पूरे गांव के स्वामित्व वाली भूमि की संकल्पना की गई।
मैदानी बिहार: उपजाऊ भूमि का समर्पण (६.४४ लाख एकड़) का बिहार के मैदानी जिले, जो अपनी अत्यंत उपजाऊ मिट्टी के लिए जाने जाते थे, वहाँ भूमि का मूल्य बहुत अधिक था। इसके बावजूद, विनोबा जी के 'हृदय परिवर्तन' के सिद्धांत ने यहाँ के किसानों को झकझोर दिया। ६.४४ लाख एकड़ उपजाऊ भूमि का दान मिलना सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि थी। दरभंगा महाराज से लेकर छोटे जोतदारों तक ने इस यज्ञ में अपनी आहुति दी।
भूदान से ग्रामदान तक: एक वैचारिक यात्रा में विनोबा जी केवल भूमि के पुनर्वितरण तक नहीं रुकना चाहते थे। उनका लक्ष्य था—'ग्राम स्वराज्य'। उन्होंने 'भूदान' को 'ग्रामदान' में बदला। ग्रामदान का अर्थ था कि गांव की सारी भूमि सामूहिक होगी, कोई उसका व्यक्तिगत स्वामी नहीं होगा। इससे गांव एक परिवार की तरह विकसित हो सकें। उन्होंने 'जय जगत' का नारा दिया, जो वसुधैव कुटुंबकम का आधुनिक संस्करण था। उनके लिए राजनीति 'लोकनीति' में बदलनी चाहिए थी, जहाँ सत्ता का विकेंद्रीकरण हो और समाज का अंतिम व्यक्ति (अंत्योदय) निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बने।
आचार्यकुल: शिक्षा और संस्कारों का संगम है। विनोबा भावे ने समाज को वैचारिक नेतृत्व देने के लिए 'आचार्यकुल' की स्थापना की। उनका मानना था कि शिक्षक और बुद्धिजीवी राजनीति से स्वतंत्र होने चाहिए ताकि वे समाज को निष्पक्ष मार्गदर्शन दे सकें। आचार्यकुल का उद्देश्य शिक्षा को जीवन मूल्यों से जोड़ना और समाज में शिक्षकों की गरिमा को पुनः स्थापित करना था। बाद के वर्षों में भूदान में प्राप्त भूमि के वितरण में प्रशासनिक शिथिलता और कानूनी अड़चनें आईं। कुछ दान की गई जमीनें अनुपजाऊ थीं या विवादित थीं। लेकिन आंदोलन की सफलता केवल एकड़ में नहीं नापी जानी चाहिए। इसकी वास्तविक सफलता इस बात में थी कि इसने भारत के सदियों पुराने सामंती अहंकार को चुनौती दी और 'संपत्ति दान' को एक धार्मिक कर्तव्य के बजाय एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में स्थापित किया।
२१वीं सदी में विनोबा की राह में आज जब दुनिया पूंजीवाद और असमानता के चरम पर है, विनोबा भावे का विचार अधिक प्रासंगिक हो जाता है। बिहार और झारखंड की धरती से जो त्याग की लहर उठी थी, वह आज भी हमें याद दिलाती है कि समाज का कल्याण संचय में नहीं, बल्कि 'साझा' करने में है। आचार्य विनोबा भावे के शब्दों में—"प्रेम ही वह एकमात्र शक्ति है जो समाज को जोड़ सकती है।" बिहार-झारखंड के २१.१७ लाख एकड़ भूमि का दान महज़ एक सांख्यिकी नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना के उच्चतम स्तर का प्रमाण है। उन गुमनाम दाताओं और उस महान संत को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने मिट्टी के कण-कण में मानवता के बीज बोए।
"सबै भूमि गोपाल की, सब संपति रघुपति कै।
जहानाबाद बिहार
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