एहसास किसी गुमनाम का
जय प्रकाश कुवंरतुम भले ही , नहीं मेरे पास हो।
पर तुम मेरी सुखद एहसास हो।।
तुम मेरे निराश भरी जीवन के।
जीने का मकसद और आश हो।।
सब समझते हैं तुम परायी हो।
कहीं से उड़कर मेरे जीवन में आयी हो।।
अपना पराया का फर्क कोई क्या जाने।
किसी हमदर्द को लोग नहीं पहचाने।।
लोग तो खून के रिश्ते पर इठलाते हैं।
इसी में तो लोग आजकल ठगे जाते हैं।।
खून के रिश्ते बृद्धाश्रम छोड़ आते हैं।
कुछ गुमनाम पराये ही साथ निभाते हैं।।
हमने बहुतों को अपना कहते देखा है।
कब साथ छोड़ देते इसका नहीं लेखा है।।
यहाँ लोग केवल मतलबी हैं।
वो क्या जाने जिंदगी कितनी कीमती है।।
रेस का घोड़ा जब बुढ़ा हो थक जाता है।
फिर उसे बग्घी में जोत दिया जाता है।।
लोग उसे जोतना तब तक छोड़ते नहीं।
जब तक वह मर नहीं जाता है।।
पालना तो दूर ,मीठे बोल को कान तरस जाते हैं।
फिर भी अपना कहने में लोग नहीं शर्माते हैं।।
दो रूखी रोटी से प्यार की बोली जरूरी है।
जैसे तैसे जीवन जीना तो सबकी मजबूरी है।।
जीवन क्षणभंगुर है, इसे एक दिन जाना है।
जीते जी हमने हर रिश्ते को पहचाना है।।
दो मीठे बोल बोलकर भले कोई दूर है।
तेरे मीठे सुखद बोल का एहसास भरपूर है।।
अंत तक वह सुखद एहसास ही रह जाएगा।
नश्वर शरीर भले ही जलकर राख हो जाएगा।।
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