तन्हा हैं सफ़र में,
डॉ अ कीर्ति वर्द्धनतन्हा हैं सफ़र में, कोई सहारा नहीं है,
तुम बिन हमारा, कहीं गुज़ारा नही है।
ढूँढते हर तरफ़ तुमको, कहीं नज़र नहीं आते,
कहाँ छुप गये हो, मौजूदगी का इशारा नहीं है।
नदिया को समेटा, हदों को किनारा बता दिया,
बरसात में दरिया का, कोई किनारा नहीं है।
इश्क़ सूरत से था, हर पल निहारते रहते थे,
कहाँ छुप गये हो, तेरे बिन अपना सहारा नही है।
अब ख्वाब में भी तेरा चेहरा नजर नहीं आता,
पर जुदा करना, अश्कों को मेरे गंवारा नहीं है।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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