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ग्रीष्म का दोपहर

ग्रीष्म का दोपहर

अरुण दिव्यांश


वरदान या अभिशाप ,
ग्रीष्म का यह दोपहर ।
चैन न आता है तन में ,
तन यह तप रहा लहर ।।
जीने से मरना बेहतर ,
कैसा प्राकृतिक कहर ।
जल जलकर मर रहा ,
लगता है तीखा जहर ।।
घर से लेकर वन बाग में ,
ग्रीष्म है एक ही राग में ।
बाहर हो ऐसा एहसास ,
जन्मा है ग्रीष्म नाग में ।।
गाॅंव में भी रहम नहीं है ,
रहम नहीं कहीं शहर में ।
काश मिलता पास कहीं ,
कूद पड़ता शीघ्र नहर में ।।
हो जाता ये आनंदित मन ,
ग्रीष्म के इस दोपहर में ।
दिवा से बेहतर देवी निशा ,
शशि राहत निज पहर में ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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