ग्रीष्म का दोपहर
अरुण दिव्यांशवरदान या अभिशाप ,
ग्रीष्म का यह दोपहर ।
चैन न आता है तन में ,
तन यह तप रहा लहर ।।
जीने से मरना बेहतर ,
कैसा प्राकृतिक कहर ।
जल जलकर मर रहा ,
लगता है तीखा जहर ।।
घर से लेकर वन बाग में ,
ग्रीष्म है एक ही राग में ।
बाहर हो ऐसा एहसास ,
जन्मा है ग्रीष्म नाग में ।।
गाॅंव में भी रहम नहीं है ,
रहम नहीं कहीं शहर में ।
काश मिलता पास कहीं ,
कूद पड़ता शीघ्र नहर में ।।
हो जाता ये आनंदित मन ,
ग्रीष्म के इस दोपहर में ।
दिवा से बेहतर देवी निशा ,
शशि राहत निज पहर में ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews