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केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज लेह में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के प्रदर्शन का उद्घाटन किया

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज लेह में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के प्रदर्शन का उद्घाटन किया

  • 75 वर्षों बाद भगवान बुद्ध के अवशेषों का पवित्र बुद्ध पूर्णिमा के दिन लद्दाख लौटना एक ऐतिहासिक और मणिकांचन अवसर है
  • भगवान बुद्ध द्वारा दिया गया ज्ञान आज 2500 वर्षों बाद भी पूरी दुनिया के लिए उतना ही प्रासंगिक है
  • भारतीय संस्कृति और भगवान बुद्ध का महान संदेश, संवाद से समाधान और मध्यम मार्ग की राह दिखाता है
  • लद्दाख केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि बौद्ध संस्कृति और करुणा की जीवंत प्रयोगशाला है
  • लद्दाख ने अपनी चार प्रमुख परंपराओं – न्यिंग्मा, काग्यु, शाक्य और गेलुग – के माध्यम से मोक्ष का मार्ग दिखाया है
  • लद्दाख की विरासत बताती है कि संघर्ष और अशांति के बीच शांति और करुणा का मार्ग ही अंतिम समाधान दे सकता है

प्रविष्टि तिथि: 01 MAY 2026 7:55PM by PIB Delhi


केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज लेह में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के प्रदर्शन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर लद्दाख के उपराज्यपाल श्री वी के सक्सेना और केन्द्रीय गृह सचिव सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
अपने संबोधन में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि आज की बुद्ध पूर्णिमा लद्दाख के निवासियों के लिए मणिकांचन अवसर है। उन्होंने कहा कि बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर 75 साल बाद भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष यहां आने से बौद्ध धर्म के साथ ही अन्य मतों के अनुयायी इनसे ऊर्जा प्राप्त करेंगे।
श्री अमित शाह ने कहा कि भगवान बुद्ध की तरह शायद ही किसी के जीवन में ऐसा होगा कि जन्म, ज्ञानप्राप्ति और महापरिनिर्वाण एक ही दिन हुए हों, इसीलिए आज का दिन हम सबके लिए बहुत शुभ और प्रेरणादायक दिन है। उन्होंने कहा कि आज धर्मिक आयोजन के साथ-साथ एक ऐतिहासिक पुनर्मिलन भी है। इतने साल के बाद इस पवित्र भूमि पर तथागत बुद्ध अपनी सबसे प्रिय भूमि पर लौटे हैं, जो बहुत सौभाग्य का विषय है। उन्होंने कहा कि लद्दाख सैकड़ों वर्षों से धम्म की जीवंत भूमि रहा है। जब दलाई लामा यहां आते हैं तो वे कहते हैं कि ये भूमि केवल भौगोलिक भूमि नहीं है बल्कि बौद्ध संस्कृति और करुणा की जीवंत प्रयोगशाला है। श्री शाह ने कहा कि इस भूमि पर ज्ञान का संरक्षण और संवर्धन हुआ है। जब भी बौद्ध धर्म पर संकट आए तब इस भूमि ने भगवान बुद्ध के संदेश को संरक्षित करने का काम किया। जब शांतिकाल आया तो उस संरक्षित और संवर्धित किए हुए ज्ञान को आगे बढ़ाने का भी काम किया। उन्होंने कहा कि यही रास्ता भारत में दिए गए तथागत के उपदेश को चीन और कई देशों में पहुंचाने का माध्यम बना।
केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि लद्दाख की आध्यात्मिक पहचान चार प्रमुख परंपराओं – न्यिंग्मा, काग्यु, शाक्य और गेलुग - से बनी है। पहली, जो जैसा है उसे वैसा ही देखिए। दूसरी, गुरु की कृपा और निरंतर आत्मचिंतन ही मुक्ति का द्वार है। तीसरी, ज्ञान साधना के बिना अधूरा है और साधना ज्ञान के बिना अंधी होती है इसीलिए ज्ञान और साधना का मिलन ही सही रास्ता है। चौथी, नैतिक अनुशासन नहीं है तो कभी प्रज्ञावान जीवन नहीं बन सकता। श्री शाह ने कहा कि लद्दाख की भूमि से निकला .यह संदेश आज विश्व के लिए जीवन को आगे ले जाने का कारण बना है।

श्री अमित शाह ने कहा कि लद्दाख में इन पवित्र अवशेषों की उपस्थिति हमें याद दिलाती है कि भारत की सभ्यता हज़ारों वर्षों से शांति और सहअस्तित्व का संदेश दे रही है। उन्होंने कहा कि लद्दाख और कारगिल जैसे विविधताओं से भरे स्थानों में यह संदेश और प्रासंगिक हो जाता है। यह विरासत आज भी हमें बताती है कि संघर्ष और अशांति के बीच शांति और करुणा का मार्ग ही हमें अंतिम समाधान दे सकता है।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि लद्दाख में कई सदियों से बौद्ध धर्म अलग-अलग तरीकों से और अलग-अलग समय पर पहुंचता और पनपता रहा और विकसित होकर लद्दाख से बाहर भी गया है। उन्होंने कहा कि लद्दाख, कश्मीर के बौद्ध अध्ययन, महायान दर्शन और बौद्ध कला का प्राचीन केंद्र था और वहीं से लद्दाख को सबसे पहले बौद्ध धर्म का संपर्क, संसर्ग और सत्संग करने का रास्ता मिला। सम्राट अशोक के दूतों ने लद्दाख में बौद्ध प्रभाव की नींव रखी। श्री शाह ने कहा कि कुषाण काल में लगभग पहली और तीसरी सदी में महायान बौद्ध धर्म का उत्कर्ष और उसका विकास लद्दाख तक पहुंचा। कई प्राचीन स्तूप, बौद्ध प्रतिमाएं, खरोष्टी-ब्राह्मी अभिलेख इस बात के साक्षी है कि इस काल में भी बौद्ध धर्म यहां आगे बढ़ा।

गृह मंत्री ने कहा कि सिल्क रूट के कारण भी कश्मीर, लेह, यारकंद, खोतान और तिब्बत को जोड़ने वाले मार्ग सिर्फ व्यापार ही नहीं बल्कि विचार के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण बना। श्री शाह ने कहा कि सातवीं से 10वीं सदी में महायान और वज्रयान परंपराएं तिब्बत से लद्दाख पहुंची और यहां पर तथागत का संदेश समृद्ध हुआ। इसके बाद निर्णायक योगदान 10वीं - 11वीं सदी में आया जब संस्कृत ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद हुआ। 108 मठों की स्थापना हुई, अलची मठ की स्थापना हुई और बौद्ध धर्म को संस्थागत और स्थाई स्वरूप दिया गया।


श्री अमित शाह ने कहा कि आज भी पूरी दुनिया में जहां-जहां बौद्ध परंपरा है, वहां लद्दाख से संवर्धित हुआ यह ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होने कहा कि महायान बौद्ध साहित्य में कहा गया है कि जब पवित्र अवशेषों का दर्शन करने का सौभाग्य मिलता है, तब बुद्ध का ही दर्शन करने का सौभाग्य मिलता है। आज इतने लंबे समय के बाद लद्दाख की जनता को स्वयं भगवान बुद्ध का दर्शन करने का सौभाग्य मिल रहा है। गृह मंत्री ने लद्दाख प्रशासन से आग्रह किया कि सभी मतों, विशेषकर बौद्ध धर्म, के अनुयायियों के यहां आने और दर्शन करने की संपूर्ण व्यवस्था करे। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध ने जब ज्ञान प्राप्त किया और भिक्षुओं के माध्यम से उसका प्रचार-प्रसार किया, उस वक्त बुद्ध का ज्ञान जितना प्रासंगिक था, आज 2500 साल बाद बुद्ध का ज्ञान दुनिया के लिए और भी ज्यादा प्रासंगिक है। श्री शाह ने कहा कि पूरी दुनिया को भारत के ज्ञान और भगवान बुद्ध के महान संदेश को समझ और स्वीकार कर, समाधान के रास्ते पर चलना चाहिए और मध्यम मार्ग पर बढ़ना चाहिए।


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