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"कलम का कठघरा"

"कलम का कठघरा"

पंकज शर्मा
समाचार अब
सिर्फ़ घटनाओं का वृत्तांत नहीं,
कई बार वह
सत्ता के दरबार में बैठा
एक प्रशिक्षित मौन है—
जो सच को जानता है,
पर उसे उच्चारित करने से डरता है।


मैं सोचता हूँ—
कलम कब से
प्रश्नों की जगह प्रशस्तियाँ लिखने लगी?
कब आईने ने
चेहरों को दिखाना छोड़
उनकी इच्छाओं का प्रतिबिंब बनना सीख लिया?
और कब पत्रकारिता ने
लोक की चौपाल से उठकर
राजमहलों की दहलीज़ चुन ली?


लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी
तानाशाह का जन्म नहीं होती,
बल्कि वह क्षण होता है
जब शब्द
अपने ही अर्थ से निर्वासित हो जाते हैं,
और सत्य
प्रसारण से पहले
अनुमति की प्रतीक्षा करने लगता है।


अब समाचार कक्षों में
बहस कम, प्रदर्शन अधिक है।
चेहरों पर गंभीरता है,
पर भाषा में विदूषक का उत्साह।
शोर इतना है
कि प्रश्नों की हड्डियाँ टूट जाती हैं,
और दर्शक उसे ही
विचार समझने लगते हैं।


पर सत्य का स्वभाव विचित्र है—
वह बिकता नहीं,
केवल विलंबित होता है।
वह किसी विज्ञापनदाता की तिजोरी में
स्थायी निवास नहीं बनाता।
एक दिन
वह बंद कक्षों की दीवारों से भी
रिसकर बाहर आ जाता है,
जैसे अँधेरे के भीतर
छिपी हुई भोर।


इसलिए कलम का धर्म
किसी सिंहासन का अलंकार होना नहीं,
बल्कि उस अकेले मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना है
जिसकी आवाज़
भीड़ के कोलाहल में दब गई है।
पत्रकारिता तब ही जीवित है
जब वह भय से मुक्त होकर
सत्ता से प्रश्न करती है,
और उतनी ही निष्ठा से
समाज के आत्मप्रवंचनों को भी
कठघरे में खड़ा करती है।
क्योंकि अंततः
समाचार का मूल्य उसके शब्दों में नहीं,
उस साहस में होता है
जिससे वे शब्द लिखे गए हों॥


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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