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ज्येष्ठ मास महात्मय {सत्ताईसवां अध्याय}

ज्येष्ठ मास महात्मय {सत्ताईसवां अध्याय}

लेखक: आनन्द हठीला
ऋषि लोग बोले कि हे स्कन्द जी ! दुःख शोक भय से आक्रान्त, एकाकी वन में स्थित उस असहाय पतिव्रता मनस्विनी ने क्या किया ? ॥ १ ॥

स्कन्द जी बोले कि हे ऋषि लोग ! सावित्री को पतिव्रता जानकर धर्मराज स्वयं आये, उस पुरुप को शरीर से जाज्वल्यमान देखकर वह भामिनी ॥ २ ॥

वाक्यत्रिदुपी वचन बोली कि हे पुरुप ! लोकभयंकर तुम कौन हो ? । यमराज बोले कि वरारोहे ! हे मनस्विनि । तुम्हारा पति क्षीणायु है ॥ ३ ॥

हे देवि ! हे शुभे ! तुम्हारा दुर्विपह तेज सहन करने योग्य नहीं है, हे महाभागे ! यह जान कर मैं यहां स्वयं आया हूँ ॥ ४ ॥

यह उस वरारोहा सावित्री से कहकर उस महात्मा के देह से अङ्गुष्ठमात्र पुरुष को पाश से सुस्थिर बांध कर ॥ ५ ॥

वेग से खींचा और उसे लेकर यमराज अपनी यमपुरी को चले, तदनन्तर उस पति के पीछे सावित्री भी चली ॥ ६ ॥

यमराज बोले कि हे महाभागे ! तुम बहुत दूरतक चली आई हो अब लौट जाओ, और अपने गृह जाकर शीघ्र औध्र्ध्वदेहिक (पारलौकिक) क्रिया को करो ॥ ७ ॥

इस तरह यमराज के कहने पर उस समय सावित्री यमराज से बोली कि हे मानद ! ओपके समीप मुझे श्रम नहीं है और न मुझे ग्लानि है ॥ ८ ॥

हे सुरेश्वर ! विशेष कर तो पति के समीप मुझे ग्लानि क्यों होगी? आप धर्म से पालन करते है, धर्म से बढ़ाते है ॥ ९ ॥

आज आपका दर्शन निष्फल नहीं है, और सत्पुरुपों कहना है कि आपका दर्शन कभी भी निष्फल नहीं होता । तथा वेद के ज्ञाता लोग कहते है कि कि मैत्री साप्तपदी (सात पग साथ चलने से होती हैं ॥ १० ॥

उस समय सावित्री के वचन से धर्मराज प्रसन्न होगये और वरों के मालिक तथा वरों के दाता यमराज ने उस सानित्री को वर दिया ॥ ११ ॥

सावित्री ने यमराज से सास श्वशुर के लिये नेत्रप्राप्ति राज्यप्राप्ति रूप वर मांगा और पिता के लिये तथा अपने लिये सौ सौ (१००) पुत्र का होना रूप वर मांगा ॥१२॥

तथा यमराज की आज्ञा से पति का जीवन रूप वर भी मांगा । तदनन्तर सुत्रता सावित्री ने धर्मराज की प्रदक्षिणा की ॥ १३ ॥

सावित्री के सभी वरों को देकर यमराज अपने लोक को गये, बाद सावित्री वट वृक्ष के समीप जाकर पति का शिर अपने गोद में पूर्ववत् कर बैठ गई ॥ १४॥

हे ब्रह्मन् ! तदनन्तर वह सत्यवान् जागकर यह वचन बोले कि हे वरारोहे ! हे भामिनि ! मैने इस समय स्वप्न देखा हैं ॥ १५ ॥

वह सत्र और सावित्री के सम्बन्ध का जो समाचार था वह सब सत्यवान् ने सावित्री से कहा । और सावित्री ने भी यमराज के साथ जो बात चीत हुई थी उसे कहा ॥ १६ ॥

सूर्य नारायण के अस्त होने पर राजा द्युमत्सेन पुत्र के आगमन की आकांक्षा से इधर उधर दौड़ने लगे ॥ १७ ॥

राजा द्युमत्सेन पुत्रदर्शन की आकांक्षा से एक आश्रम से दूसरे आश्रम को जाते है और न मिलने पर विलाप करते है कि हम दोनों अन्धो का यष्टि (लकड़ी) समान वह सत्यवान् विना हम दोनों के कहां गया ।॥१८॥

इस तरह वह सपत्नीक राजा विलाप करता हुआ दुःख से सन्तप्त होकर बारम्बार हे पुत्र ! हे पुत्र ! कहकर पुकारने लगा ॥१९॥

हे ब्राह्मण लोग ! अकस्मात् राजा द्युमत्सेन के नेत्र खुल गये। यह परम आश्चर्य देखकर ॥२०॥

आश्रमवासी तपस्वियों ने शान्तिपूर्वक वचन कहा कि हे महाराज ! हे महामते ! इस चक्षु (नेत्र) के मिलने से यह सूचित (मालूम होता है ॥ २१ ॥

कि आपको पुत्र के साथ संयोग होगा ॥२२॥

स्कन्दजी बोले कि हे ब्राह्मण लोग ! जबतक वे तपस्वी लोग इस तरह बात कर रहे थे, इतने में सत्यवान् ने समस्त द्विजों को नमस्कार कर माता पिता को नमस्कार किया ॥२३॥

हे ब्रह्मन् ! तदनन्तर वह कमलेक्षणा सावित्री ने सास श्वशुर के चरणों को प्रणाम किया ॥ २४ ॥

मुनिलोग बोले कि हे सावित्री! हे वरवर्णिनि ! हे वरानने ! तुम वृद्ध श्वशुर के नेत्र-प्राप्ति का कारण जानती हो क्या ? ॥ २५ ॥

सावित्री बोली कि हे मुनिश्रेष्ठ ! मै नेत्रप्राप्ति का कारण नहीं जानती हूँ, किन्तु मेरे पति देवता अधिक देरतक सो गये थे इसलिये देर हो गई है ॥ २६॥

सत्यवान् बोले कि हे ब्राह्मण लोग ! इस सावित्री के प्रभाव से सब कुछ हुआ है परन्तु इसका कारण दृश्य नहीं है, यह सब सावित्री के तप का फल हैं ॥ २७॥

मैं तो इस समय सावित्री के व्रत का ही माहात्म्य देख रहा हूँ ॥ २८॥

स्कन्दजी बोले कि हे प्रभो ! इस तरह सत्यवान् के साथ बात हो रही थी इतने में राजा द्युमत्सेन के पुरवासी लोगों ने आकर कहा कि हे राजन् ! वह राजा मारा गया ॥ २९ ॥

हे राजन् ! जिस क्रूर मन्जी ने आपका राज्य हरण किया था वह आपका शत्रु भी मन्त्री से मारा गया, इस लिये ये सब पुरवासी आपके पास आये है ॥ ३० ॥

हे राज-शार्दूल ! हे प्रभो ! आप उठिये और अपने राज्य का पालन कीजिये, हे राजेन्द्र ! आप मन्त्री पुरोहितों के द्वारा राज्यासन पर अभिषिक्त हों ।॥ ३१ ॥

स्कन्द जी बोले कि हे विप्र ! वह राजश्रेष्ठ पुरवासियो के साथ अपने नगर को जाकर पितृपैतामह का राज्य महात्मा द्युमत्सेन ने प्राप्त किया ॥ ३२॥

सावित्री और सत्यवान् दोनों परम आनन्द के भागी भये और 'बाहुशाली सौ पुत्रों को पैदा किया ॥ ३३ ॥

तथा व्रत के माहात्म्य से सावित्री के पिता अश्वपति को भी यमराज के प्रसाद से सौ पुत्र हुये ॥ ३४ ॥

हे विप्र ! यह उत्तम व्रतमाहात्म्य आपलोगों से कहा, इसी व्रत के प्रभाव से चीणायु सावित्री का भर्त्ता जीवित हो गया। यह व्रत समस्त त्रियों को करना चाहिये, यह व्रत अवैधव्य (पतिसौभाग्य) फत्त को देने वाला है ॥ ३५ ॥

इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सना-ट्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २ - ॥
क्रमशः...
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