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अरवल की नीलमणि: सोन, पुनपुन और मोरहर नदिया

अरवल की नीलमणि: सोन, पुनपुन और मोरहर नदिया

सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार के मगध प्रमंडल के अंतर्गत आने वाला अरवल जिला न केवल अपनी उर्वर भूमि के लिए जाना जाता है, बल्कि यह नदियों के एक ऐसे तंत्र पर बसा है जो प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक इसकी जीवन रेखा रही है। अरवल की भौगोलिक बनावट और कृषि व्यवस्था मुख्यतः तीन प्रमुख नदियों— सोन, पुनपुन और मोरहर पर आधारित है। ये नदियाँ यहाँ के जनजीवन, लोकगीतों, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण की आधारशिला हैं।
सोन नद: अमरकंटक का आशीर्वाद और सिंचाई का स्वर्ण युग - सोन नदी, जिसे स्वर्ण नदी भी कहा जाता है, अरवल के दक्षिण-पश्चिम हिस्से की प्रहरी है। इसकी विशालता और इसके द्वारा लाई गई बालू (रेत) अरवल के राजस्व का एक मुख्य स्रोत है। सोन नद मध्य भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित अमरकंटक पर्वतमाला की मैकाल पहाड़ियों से निकलती है। यह एक 'नद' है (पुल्लिंग रूप में संबोधित), जो अपनी चौड़ी धारा के लिए विख्यात है। अरवल और कलेर प्रखंडों से गुजरते हुए यह लगभग 325 मील (523 किमी) की लंबी यात्रा तय करती है और अंततः पटना जिले के मनेर प्रखंड के समीप शेरपुर में गंगा नदी में समाहित हो जाती है।
सोन नहर प्रणाली: 19 वीं सदी का इंजीनियरिंग चमत्कार का अरवल के कृषि इतिहास में 1869 का वर्ष मील का पत्थर साबित हुआ। सिंचाई की कमी को दूर करने के लिए औरंगाबाद जिले के बारुण प्रखंड में सोन नद पर इंद्रपुरी बराज का निर्माण शुरू हुआ। निर्माण लागत और समय: मात्र 15 लाख रुपये की लागत से 1869 में शुरू हुआ यह कार्य 1875 में पूर्ण होकर जनता को समर्पित किया गया। सोन नहर (पटना लाइन): इंद्रपुरी बराज से तीन मुख्य नहरें निकलीं— बक्सर लाइन, आरा लाइन और पटना लाइन। अरवल के लिए पटना लाइन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह 79 मील लंबी नहर है जो दानापुर तक जाती है। सिंचाई क्षमता: शुरुआत में इस प्रणाली ने 1,70,000 एकड़ भूमि के लक्ष्य के विरुद्ध 1,66,000 एकड़ भूमि को सिंचित कर अरवल के किसानों की तकदीर बदल दी। इसी प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए अरवल में कैनाल एस.डी.ओ कार्यालय की स्थापना की गई थी।
पुनपुन नदी: वैदिक ऋचाओं से वर्तमान के खेतों तक पुनपुन नदी का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। अरवल के उत्तर-पूर्वी भाग, विशेषकर करपी और कुरथा प्रखंडों में इसका प्रवाह क्षेत्र है। वेदों में पुनपुन नदी को 'कीकट' के नाम से पुकारा गया है। ऐसी मान्यता है कि गया में पितृपक्ष के दौरान फल्गु के साथ-साथ पुनपुन का भी धार्मिक महत्व है। यह नदी अरवल की सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है। झारखंड के पलामू जिले के चंदवा की पहाड़ियों से निकलकर यह नदी बिहार में प्रवेश करती है। यह एक जटिल नदी तंत्र का निर्माण करती है जिसमें कई छोटी नदियाँ आकर मिलती हैं: पुनपुन नदी की सहायक धाराएँ: रामरेखा नदी, बरकी नदी, बटाने नदी, आद्री नदी, मदार नदी और बिलारी नदी है।
झारखंड के चतरा जिले के कुंडा पर्वतों से निकलने वाली जलधाराएँ भी इसमें समाहित होती हैं। अंत में यह पटना के फतुहा में गंगा नदी के साथ संगम करती है। मोरहर और हिरण्यबाहु: विलुप्त होती विरासत और स्थानीय आधार
मोरहर नदी: करपी की जीवनधारा मोरहर नदी भी झारखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से अपना सफर शुरू करती है। अरवल जिले के करपी प्रखंड से गुजरते हुए यह पुनपुन नदी में विलीन हो जाती है। यद्यपि यह सोन की तुलना में छोटी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर खरीफ और रबी की फसलों के लिए इसका जल अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्षा ऋतु में मोरहर का जल स्तर तेजी से बढ़ता है, जो अपने साथ समृद्ध गाद लाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
विलुप्त होती वैदिक नदी: हिरण्यबाहु का अरवल के इतिहास में हिरण्यबाहु नदी का उल्लेख एक रहस्यमयी और गौरवशाली अध्याय है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, यह नदी अरवल, कलेर और करपी प्रखंडों से प्रवाहित होती थी। वर्तमान में यह नदी भौतिक रूप से विलुप्त हो चुकी है या इसकी धारा ने अपना मार्ग बदल लिया है, परंतु स्थानीय जनश्रुतियों और भौगोलिक साक्ष्यों में इसका नाम आज भी जीवित है। इसे सोन नदी की ही एक प्राचीन शाखा के रूप में भी कुछ इतिहासकार देखते है। अरवल जिले के प्रशासनिक प्रखंडों और वहां बहने वाली नदियों का संबंध निम्नलिखित है: कलेर सोन नद, हिरण्यबाहु (विलुप्त अवशेष) , अरवल सोन नद, सोन नहर, हिरण्यबाहु , करपी पुनपुन नदी, मोरहर नदी, हिरण्यबाहु , कुरथा पुनपुन नदी, मोरहर की उपधाराएँ , वंशी सोनभद्र स्थानीय जलधाराएँ और पुनपुन तंत्र है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: नदियों का वरदान में अरवल की नदियाँ केवल जल निकासी के मार्ग नहीं हैं, बल्कि जिले के सामाजिक-आर्थिक ढांचे का केंद्र हैं: सोन नहर की बदौलत अरवल 'धान का कटोरा' बनने की दिशा में अग्रसर हुआ। यहाँ की मिट्टी इन नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी है, जो कृषि के लिए सर्वोत्तम है। भू-जल पुनर्भरण का : सोन और पुनपुन नदियाँ पूरे जिले के वाटर टेबल को बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे गर्मियों में भी पेयजल की समस्या विकराल नहीं होती। सोन नदी की उच्च गुणवत्ता वाली पीली रेत पूरे बिहार में निर्माण कार्यों के लिए प्रसिद्ध है, जिससे जिले को भारी मात्रा में राजस्व प्राप्त होता है। इन नदियों के किनारे लगने वाले स्थानीय मेले और छठ जैसे त्योहार यहाँ की सांस्कृतिक एकता को दर्शाते हैं। वैदिक नदी व विलुप्त नदी हिरण्यबाहु वी बह में मधुसरवा में च्यवनेश्वर शिवलिंग मंदिर , बाधुश्रवा सरोवर , करपी जगदंबा स्थान , सतीयाडा, ब्रह्म स्थान , पुनपुन नदी तट पर अवस्थित पंचतीर्थ में सूर्यं मंदिर, शिव मंदिर , किंजर शिवमन्दिर , कोयली घाट पर माता कात्यायनी एवं शिव मंदिर , सोन नद के तट पर कागजी मोहल्ला में शिव मंदिर , अरवल में बुढ़वा महादेव , सूर्यं मंदिर है ।
आज ये नदियाँ मानवीय हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के कारण संकट में हैं। अतिक्रमण और प्रदूषण युक्त पुनपुन और मोरहर , सोन नद जैसी नदियों में कचरा प्रबंधन और उनके किनारों पर बढ़ते अतिक्रमण ने उनकी धारा को संकुचित कर दिया है। : हिरण्यबाहु जैसी नदी का विलुप्त होना एक चेतावनी है। जल संचयन और नहरों की समय पर उड़ाही आवश्यक है ताकि सोन नहर का लाभ अंतिम किसान तक पहुँच सके।
अरवल जिले की भौगोलिक और कृषि व्यवस्था का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यहाँ की तीन नदियाँ— सोन, पुनपुन और मोरहर—अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच का सेतु हैं। जहाँ सोन ने आधुनिकीकरण और सिंचाई का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं पुनपुन ने अपनी वैदिक पहचान को बचाए रखा। इन नदियों का प्रवाह केवल जल का बहाव नहीं, बल्कि अरवल की रगों में दौड़ता हुआ जीवन है। इन जल स्रोतों का संरक्षण ही अरवल की समृद्धि की स्थायी गारंटी है।
संदर्भ: वेदों में वर्णित 'कीकट' नदी (पुनपुन) का विवरण। , सोन नहर विभाग, अरवल (कैनाल एस.डी.ओ कार्यालय) के ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स। इंद्रपुरी बराज निर्माण अभिलेख (1869-1875)।
डिस्ट्रिक्ट गजेटियर गया 1906 , 1957 , स्थानीय भौगोलिक सर्वेक्षण और प्रखंडवार नदी प्रवाह प्रतिवेदन।
करपी, अरवल बिहार 804419
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